Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 21

43 Mantra
5/21
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- औतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्ची पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
विष्णो॑ र॒राट॑मसि॒ विष्णोः॒ श्नप्त्रे॑ स्थो॒ विष्णोः॒ स्यूर॑सि॒ विष्णोर्ध्रु॒वोऽसि॒। वै॒ष्ण॒वम॑सि॒ विष्ण॑वे त्वा॥२१॥

विष्णोः॑। र॒राट॑म्। अ॒सि॒। विष्णेः॑। श्नप्त्रे॒ऽइति॒ श्नप्त्रे॑। स्थः॒। विष्णोः॑। स्यूः। अ॒सि॒। विष्णोः॑। ध्रु॒वः। अ॒सि॒। वै॒ष्ण॒वम्। अ॒सि॒। विष्ण॑वे। त्वा॒ ॥२१॥

Mantra without Swara
विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रे स्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोर्ध्रुवोसि । वैष्णवमसि विष्णवे त्वा ॥

विष्णोः। रराटम्। असि। विष्णेः। श्नप्त्रेऽइति श्नप्त्रे। स्थः। विष्णोः। स्यूः। असि। विष्णोः। ध्रुवः। असि। वैष्णवम्। असि। विष्णवे। त्वा॥२१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो यह नाना प्रकार का जगत् (असि) है वह (विष्णो:) व्यापक विष्णु की (रराटम्) परिभाषा (असि) है। अर्थात् उसको बतलाने वाला है, एवं विष्णु से उत्पन्न होकर विद्यमान है।
(विष्णोः) सब सुखों से भरपूर विष्णु से (स्यू:) सीया हुग्रा (असि) है, [विष्णोः] सब जगत् के पालक विष्णु से [ध्रुवः] स्थिर [असि] है। सारा जगत् (वैष्णवम्) विष्णु अर्थात् यज्ञ का साधन वा साधक (असि) है।
जिस (विष्णोः) सर्वत्र प्रविष्ट विष्णु के जगत् में दो (श्ननप्त्रे) शुद्ध जड़ और चेतन समूह (स्थः) हैं। उस सब जगत् के उत्पादक [त्वा] आप जगदीश्वर का हम लोग (विष्णवे) यज्ञानुष्ठान के लिये आश्रय ग्रहण करते हैं ।।५।२१ ।।
Essence
इस सारे जगत् का परमेश्वर ही रचने वाला, धारण करने वाला, व्यापक इष्टदेव है। सब मनुष्य ऐसा समझकर सब कामनाओं की सिद्धि करें ॥ ५ । २१ ।।
Subject
फिर वह जगदीश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
(असि) अस्ति। इस मन्त्र में 'असि' पद पर सर्वत्र व्यत्यय है। (श्ननप्त्रे) 'श्ननप्त्र' शब्द शुद्धि अर्थ वाली 'ष्णा' धातु के वर्णव्यत्यय से सकार को शकार करके सिद्ध होता है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० ( ३।५।३।२४-२५ ) में की गई है ।। ५ । २१ ।।
Commentary Essence
विष्णु (ईश्वर) कैसा है--यह तीन प्रकार का जगत् विष्णु अर्थात् व्यापक ईश्वर की परिभाषा है अर्थात् उसका बोधक है, विष्णु से उत्पन्न होकर विद्यमान है। सब सुखों से भरपूर विष्णु ने इसको सीया है, बनाया है, सब जगत् के पालक विष्णु ने इसे स्थिर किया है, धारण किया है, इस लिये यह जगत् वैष्णव कहलाता है। सर्वत्र प्रविष्ट विष्णु के जगत् के जड़ और चेतन दो शुद्ध रूप हैं। सब जगत् का उत्पादक, जगत् का स्वामी विष्णु यज्ञानुष्ठान के लिये सब कामनाओं की सिद्धि के लिये, आश्रय करने योग्य है। सब का इष्टदेव है ।। ५ । २१।।
Elsewhere Availablity
महर्षि ने ‘वैष्णवमसि' इस मन्त्रांश को सत्यार्थ प्रकाश (एकादश समुल्लास) में वैष्णव-मत की समीक्षा में उद्धृत किया है।