Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 2

43 Mantra
5/2
Devata- विष्णुर्यज्ञो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- आर्षी गायत्री Swara- षड्जः, धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ग्नेर्ज॒नित्र॑मसि॒ वृष॑णौ स्थऽउ॒र्वश्य॑स्या॒युर॑सि पुरू॒रवा॑ऽअसि। गा॒य॒त्रेण॑ त्वा॒ छन्द॑सा मन्थामि॒ त्रैष्टु॑भेन त्वा॒ छन्द॑सा मन्थामि॒ जाग॑तेन त्वा॒ छन्द॑सा मन्थामि॥२॥

अ॒ग्नेः। ज॒नित्र॑म्। अ॒सि॒। वृष॑णौ। स्थः॒। उ॒र्वशी॑। अ॒सि॒। आ॒युः। अ॒सि॒। पु॒रू॒रवाः॑। अ॒सि॒। गा॒य॒त्रेण॑। त्वा॒। छन्द॑सा। म॒न्था॒मि॒। त्रैष्टु॑भेन। त्वा॒। छन्द॑सा। म॒न्था॒मि॒। जाग॑तेन। त्वा॒। छन्द॑सा। म॒न्था॒मि॒ ॥२॥

Mantra without Swara
अग्नेर्जनित्रमसि वृषणौ स्थऽउर्वश्यस्यायुरसि पुरूरवाऽअसि गायत्रेण त्वा छन्दसा मन्थामि त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसा मन्थामि जागतेन त्वा छन्दसा मन्थामि ॥

अग्नेः। जनित्रम्। असि। वृषणौ। स्थः। उर्वशी। असि। आयुः। असि। पुरूरवाः। असि। गायत्रेण। त्वा। छन्दसा। मन्थामि। त्रैष्टुभेन। त्वा। छन्दसा। मन्थामि। जागतेन। त्वा। छन्दसा। मन्थामि॥२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे मैं जो (अग्नेः) आग्नेय अस्त्र की सिद्धि करने वाले अग्नि का (जनित्रम्) उत्पादक हवि (असि) है, और जो (वृषणौ) वर्षा कराने वाले सूर्य और वायु (स्थः) हैं, और जो (उर्वशी) नाना सुखों को प्राप्त कराने वाली यज्ञ क्रिया, और जो (आयुः) जीवन-साधन (असि) है, और जो (पुरुरवाः) सब शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन रूप यज्ञ से उपदेश करने वाला (असि) है (त्वा) उस अग्नि को (गायत्रेण) गायत्री प्रगाथ वाले (छन्दसा) आनन्दित करने वाले छन्द से (मन्थामि) विलोडन आदि क्रिया से सिद्ध करता हूँ, और (त्वा) उस सोम आदि औषधियों को (त्रैष्टुभेन) त्रिष्टुप् प्रगाथ वाले (छन्दसा) सुखकारक छन्द से (मन्थामि) मथता हूँ ।
(त्वा) उस सामग्री को वा शत्रुजन्य दुःखों को (जागतेन) जगती प्रगाथ वाले (छन्दसा) सुख के साधक छन्द से (मन्थामि) विलोडित करके हटाता हूँ, वैसे तुम भी इन सबका अनुष्ठान करके इन्हें सिद्ध करो ॥ ५ । २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है॥ सब मनुष्य इस रीति से उक्त यज्ञ द्वारा परोपकार को सिद्ध करें ॥ ५ । २ ॥
Subject
फिर वह यज्ञ कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है ।
Refrences
(असि) अस्ति । इस मन्त्र में 'असि' पद पर सर्वत्र पुरुष-व्यत्यय है। (उर्वशी) यह शब्द निघं० (५ । ५) में पद नामों में पढ़ा है । (उरु) शब्द निघं० (३।१) में बहुवाचक नामों में है। 'उरु'-पूर्वक 'अशूङ्' धातु से 'सम्पदादिभ्यः क्विप्' [अ० ३।३।१०८] इस वार्त्तिक से 'क्विप्' प्रत्यय और शार्ङ्गरवादि के अन्तर्गत इसका पाठ मान कर [शार्ङ्गरवाद्यञ्जोङीन्, अ. ४।१।७३ ] इस सूत्र से 'ङीन्' प्रत्यय करने पर 'उर्वशी' शब्द सिद्ध होता है। (पुरुरवाः) यह शब्द निघं० (५ । ४) में पद-नामों में पढ़ा है। 'पुरुरवाः' (उणा. ४।२३२) सूत्र से 'पुरु' पूर्वक 'रु' धातु से 'असि' प्रत्ययान्त होने से निपातितहै। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।४।१।२०-२३) में की गई है ॥ ५ ॥२॥
Commentary Essence
१. यज्ञ कैसा है—यज्ञ आग्नेय अस्त्र आदि को सिद्ध करने वाली अग्नि का उत्पादक है, वर्षा का निमित्त है, नाना सुखों को प्राप्त कराने वाला है, अध्ययन-अध्यापन रूप यज्ञ बहुत से शास्त्रों का उपदेश करने वाला है। यज्ञ की अग्नि गायत्री प्रगाथ वाले आनन्दकारक वेदमन्त्र से विलोडनआदि क्रिया से उत्पन्न की जाती है। इसकी सोम आदि औषधियाँ त्रिष्टुप्-प्रगाथ वाले सुखकारक वेदमन्त्र से मथी जाती हैं। यह जगती प्रगाथ वाले सुखसाधक वेदमन्त्र से शत्रुओं से उत्पन्न दुःखों को हटाता है।
२. अलङ्कार-- मन्त्र में उपमावाचक ‘इव’ आदि शब्द लुप्त हैं इसलिये वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि विद्वानों के समान सब मनुष्य उक्त रीति से यज्ञ के द्वारा परोपकार करें ।। ५ ।२ ॥