Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 19

43 Mantra
5/19
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- औतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः Chhand- निचृत् आर्षी जगती, Swara- निषादः
Mantra with Swara
दि॒वो वा॑ विष्णऽउ॒त वा॑ पृथि॒व्या म॒हो वा॑ विष्णऽउ॒रोर॒न्तरि॑क्षात्। उ॒भा हि हस्ता॒ वसु॑ना पृ॒णस्वा प्रय॑च्छ॒ दक्षि॑णा॒दोत स॒व्याद्विष्ण॑वे त्वा॥१९॥

दि॒वः। वा॒। वि॒ष्णो॒ऽइति॑ विष्णो। उ॒त। वा॒। पृ॒थि॒व्याः। म॒हः। वा॒। वि॒ष्णो॒ऽइति॑ विष्णो। उ॒रोः। अ॒न्तरि॑क्षात्। उ॒भा। हि। हस्ता॑। वसु॑ना। पृ॒णस्व॑। आ। प्र। य॒च्छ॒। दक्षि॑णात्। आ। उ॒त। स॒व्यात्। विष्ण॑वे। त्वा॒ ॥१९॥

Mantra without Swara
दिवो वा विष्णऽउत वा पृथिव्या महो वा विष्णऽउरोरन्तरिक्षात् । उभा हि हस्ता वसुना पृणस्वा प्रयच्छ दक्षिणादोत सव्यात् विष्णवे त्वा ॥

दिवः। वा। विष्णोऽइति विष्णो। उत। वा। पृथिव्याः। महः। वा। विष्णोऽइति विष्णो। उरोः। अन्तरिक्षात्। उभा। हि। हस्ता। वसुना। पृणस्व। आ। प्र। यच्छ। दक्षिणात्। आ। उत। सव्यात्। विष्णवे। त्वा॥१९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (विष्णो) चराचर जगत् में व्यापक जगदीश्वर! आप कृपा करके हमें (दिवः) प्रसिद्ध अग्नि (वा) अथवा विद्युत् (वसुना) द्रव्य से (आपृणस्व) सब ओर से तृप्त करो एवं सब सुखों को (प्रयच्छ) प्रदान करो।
(उत) और (पृथिव्याः) भूमि से उत्पन्न पदार्थों से [महः] महत्तत्त्व अव्यक्त प्रकृति से (उत) और (वा) अथवा (उरः) अनन्त (अन्तरिक्षात्) अन्तरिक्ष से (वसुना) द्रव्यों के द्वारा (द्यां पृणस्व) द्यौ को तृप्ति एवं कान्तियुक्त करो।
हे (विष्णो) सबके अन्दर प्रविष्ट जगदीश्वर! आप (दक्षिणात्) दक्षिण पार्श्व से (उत) और (सव्यात्) वाम पार्श्व से सब सुखों को ([आ] प्रयच्छ) सब ओर से प्रदान करो । (त्वा) आप की हम लोग (विष्णवे) यज्ञ के लिये अर्चना करें, पूजा करें ।। ५ । १९।।
Essence
जिस व्यापक ईश्वर ने महत्तत्त्व, सूर्य, भूमि, अन्तरिक्ष, वायु, अग्नि, जल आदि पदार्थों को और उनमें स्थित औषधि तथा मनुष्य आदि को रच कर और धारण करके सब प्राणियों के लिए सुखों को धारण किया है सब मनुष्य उसकी ही उपासना करें ।। ५ । १९।।
Subject
फिर वह जगदीश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
(उभा, हस्ता) यहाँ दोनों शब्दों में 'सुपां सुलुक्०' [ अ० ७।१।३९] सूत्र से आकार आदेश है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।५।३।२२) में की गई है ॥ ५ । १९॥
Commentary Essence
विष्णु (ईश्वर) कैसा है-- विष्णु अर्थात् ईश्वर चराचर जगत् में व्यापक है। जो प्रसिद्ध अग्नि, विद्युत्, पृथिवी, महत्तत्त्व, अव्यक्त महत्तत्व से उत्पन्न पदार्थ, अनन्त आकाश तथा इनमें विद्यमान औषधि तथा मनुष्य आदि प्राणियों को रच कर इन्हें धारण कर रहा है। सबके अन्दर प्रविष्ट ईश्वर सब ओर से सब प्राणियों को सुख प्रदान करता है। यज्ञमय विष्णु (ईश्वर) की प्राप्ति के लिये उसकी अर्चना करें, उपासना करें ।। ५ । १९।।