Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 5 / Mantra 18

43 Mantra
5/18
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- औतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः Chhand- स्वराट् आर्षी त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विष्णो॒र्नु कं॑ वी॒र्याणि॒ प्रवो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजा॑सि। योऽअस्क॑भाय॒दुत्त॑रꣳ स॒धस्थं॑ विचक्रमा॒णस्त्रे॒धोरु॑गा॒यो विष्ण॑वे त्वा॥१८॥

विष्णोः॑। नु। क॒म्। वी॒र्या᳖णि। प्र। वो॒च॒म्। यः। पार्थि॑वानि। वि॒म॒मऽइति॑ विऽम॒मे। रजा॑सि। यः। अस्क॑भायत्। उत्त॑रमित्युत्ऽत॑रम्। स॒धस्थ॒मिति॑ स॒धऽस्थ॑म्। वि॒च॒क्र॒मा॒ण इति॑ विऽचक्रमा॒णः। त्रे॒धा। उ॒रु॒गा॒यऽइत्यु॑रुऽगा॒यः। विष्ण॑वे। त्वा ॥१८॥

Mantra without Swara
विष्णोर्नु कँवीर्याणि प्र वोचँयः पार्थिवानि विममे रजाँसि । योऽअस्कभायदुत्तरँ सधस्थँविचक्रमाणस्त्रेधोरुगायः विष्णवे त्वा ॥

विष्णोः। नु। कम्। वीर्याणि। प्र। वोचम्। यः। पार्थिवानि। विममऽइति विऽममे। रजासि। यः। अस्कभायत्। उत्तरमित्युत्ऽतरम्। सधस्थमिति सधऽस्थम्। विचक्रमाण इति विऽचक्रमाणः। त्रेधा। उरुगायऽइत्युरुऽगायः। विष्णवे। त्वा॥१८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (यः) जो अनन्त पराक्रम वाला (विचक्रमाणः) यथायोग्य जगत् रचने के लिये कारण द्रव्यों को गति देने वाला (उरुगायः) वेद द्वारा नाना अर्थों का उपदेश करने वाला विष्णु जगदीश्वर है वह (पार्थिवानि) पृथिवी के विकारों को वा अन्तरिक्ष में प्रसिद्ध (रजांसि) लोकों को (त्रेधा) तीन प्रकार से (विममे) निर्माण करता है। और--
(यः) जो सर्वाधार (उत्तरम्) अन्तिम अवयव(सधस्थम्) जो साथ रहने वाला कारण रूप है उसे ग्रहण करके (अस्कभायत्) जगत् को धारण करता है, और (विष्णवे) उपासनादि व्यापक यज्ञ के लिये जिसकी शरण में जाते हैं, जिस (विष्णो:) व्यापक परमेश्वर के (वीर्याणि) पराक्रमयुक्त कर्मों का विद्वान् लोग उपदेश करते हैं, जिसकी सब शरण लेते हैं[त्वा] उस (कम्) सुखस्वरूप देव का मैं (प्रवोचम्) उपदेश करूँ और (नु) शीघ्र प्राप्त करूँ ।।५ ।१८ ।।
Essence
सब मनुष्य, जिस परमेश्वर ने पृथिवी, सूर्य और त्रसरेणु भेद से तीन प्रकार का जगत् रच के धारण किया है, उसकी ही उपासना करें ।। ५ । १८ ।।
Subject
अब व्यापक ईश्वर के गुणों का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
(पार्थिवानि) 'पार्थिव' शब्द 'तत्र विदित इति च (अ० ५।१।४३) इस सूत्र से 'अञ्' प्रत्यय करने पर सिद्ध होता है। (रजांसि) निरु० ( ४ । १९ ) के अनुसार 'रजांसि' शब्द का अर्थ लोक है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३।५।३।२१) में की गई है ॥ ५ । १८ ॥
Commentary Essence
विष्णु (व्यापक ईश्वर) के गुण--विष्णु अर्थात् ईश्वर अनन्त पराक्रम वाला, यथायोग्य जगत् की रचना के लिये कारण द्रव्यों को गति देने वाला, नाना पदार्थों का वेद के द्वारा उपदेश करने वाला है। जो अन्तरिक्ष में विद्यमान पृथिवी, सूर्य और त्रसरेणु भेद से तीन प्रकार के जगत् की रचना करता है। जो सर्वाधार जगदीश्वर सब स्थूल पदार्थों के सह-वर्तमान अन्तिम कारण रूप जगत् को धारण कर रहा है। उपासनादि यज्ञ का वही आश्रय है। विद्वान् लोग उसके पराक्रम-युक्त कर्मों का उपदेश करते हैं। सब उसी का सहारा लेते हैं। उस सुखस्वरूप देव का उपदेश करें, उसकी स्तुति करें और शीघ्र उसी का आश्रय लेवें ।।५।१८ ॥