Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 9

37 Mantra
4/9
Devata- विद्वान् देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषयः Chhand- आर्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ऋ॒क्सा॒मयोः॒ शिल्पे॑ स्थ॒स्ते वा॒मार॑भे॒ ते मा॑ पात॒मास्य य॒ज्ञस्यो॒दृचः॑। शर्मा॑सि॒ शर्म॑ मे यच्छ॒ नम॑स्तेऽअस्तु॒ मा मा॑ हिꣳसीः॥९॥

ऋक्सा॒मयो॒रित्यृ॑क्ऽसा॒मयोः॑। शि॒ल्पे॒ऽइति॒ शि॒ल्पे॑। स्थः॒। तेऽइति॒ ते। वा॒म्। आ। र॒भे॒। तेऽइति॒ ते। मा॒। पा॒त॒म्। आ। अ॒स्य। य॒ज्ञस्य॑। उ॒दृचः॒ इत्यु॒त्ऽऋचः॑। शर्म्म॑। अ॒सि॒। शर्म्म॑। मे॒। य॒च्छ॒। नमः॑। ते॒। अ॒स्तु॒। मा। मा॒। हि॒ꣳसीः॒ ॥९॥

Mantra without Swara
ऋक्सामयोः शिल्पे स्थस्ते वामारभे ते मा पातमास्य यज्ञस्योदृचः । शर्मासि शर्म मे यच्छ नमस्ते अस्तु मा मा हिँसीः ॥

ऋक्सामयोरित्यृक्ऽसामयोः। शिल्पेऽइति शिल्पे। स्थः। तेऽइति ते। वाम्। आ। रभे। तेऽइति ते। मा। पातम्। आ। अस्य। यज्ञस्य। उदृचः इत्युत्ऽऋचः। शर्म्म। असि। शर्म्म। मे। यच्छ। नमः। ते। अस्तु। मा। मा। हिꣳसीः॥९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वन् ! मैं (ऋक्सामयोः) ॠग्वेद और सामवेद के अध्ययन के पश्चात् (उदृचः) उत्तमता से जिसमें ऋचायें प्रत्यक्ष की गई हैं उस (अस्य) इस उपदेश किये जाने वाले (यज्ञस्य) शिल्पविद्या से सिद्ध किये यज्ञ से सम्बन्धित (वां) जो (शिल्पे) मन और प्रसिद्ध प्रयोग से सिद्ध होने वाली विद्यायें [स्थः] हैं [ते] उन दोनों को (आरभे) सब ओर से आरम्भ करता हूँ।
जो [ते] वे दो (मा) मुझे (पातम्) रक्षा करती हैं, जो तेरे पास से मैं उन्हें ग्रहण करता हूँ इसलिए (ते) तुझे मेरा (नमः) उत्तम भोजन आदि से सत्कार (अस्तु) स्वीकार हो (मा) मुझे शिल्पविद्या की शिक्षा दो (मा हिंसीः) मुझे दुःख न दो अथवा टालो मत ।
और जो (शर्म) सुख [असि ] है उस (शर्म) सुख को (मे) मुझे ([आ] यच्छ) सब ओर से प्रदान करो ॥ ४ । ९॥
Essence
सब मनुष्य विद्वानों से वेदों को पढ़ कर, शिल्प विद्या को प्राप्त कर, हस्तक्रियाओं का साक्षात्कार करके, विमान आदि कार्यों को सिद्ध करके सुख की उन्नति करें ॥ ४। ९ ॥
Subject
मनुष्यों को शिल्पविद्या की सिद्धि कैसे करनी चाहिये, यह उपदेश किया है।
Refrences
(पातम्) रक्षतः यहाँ व्यत्यय है। (यच्छ) ददाति यहाँ पुरुष-व्यत्यय और लट् अर्थ में लोट् लकार है। (नमः) यह शब्द निघं० (२ । ७) में अन्न नामों में पढ़ा है। (हि७सीः) हिन्धि । यहाँ लोट् अर्थ में लुङ् लकार है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३। २। १५ - ८) में की गई है ॥ ४ । ९ ॥
Commentary Essence
शिल्प की सिद्धि कैसे करें--सब मनुष्य विद्वानों से ऋग्वेद और सामवेद का अध्ययन करके जिसमें ऋचाओं का हस्तक्रियाओं से प्रत्यक्ष किया जाता है उस शिल्प विद्या से सिद्ध होने वाले यज्ञ से सम्बन्धित क्रियाओं का प्रारम्भ करें क्योंकि ये शिल्प-क्रियायें मनुष्यों की रक्षा करने वाली हैं। जिन विद्वानों से शिल्प विद्या प्राप्त करें उनका उत्तम अन्न आदि पदार्थों से सत्कार करें और उनसे प्रार्थना करें कि हे विद्वन्! आप हमें शिल्प विद्या की शिक्षा दीजिये, हमें शिल्प विद्या से विचलित न कीजिये। इस प्रकार विद्वानों से शिल्प विद्या को सीख कर विमान आदि यानों को सिद्ध करके सुख की वृद्धि करें ॥ ४ ॥ ९ ॥