Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 7

37 Mantra
4/7
Devata- अग्निर्देवता । आपो देवता । बृहस्पतिर्देवता । Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- पङ्क्ति,आर्षी बृहती, Swara- पञ्चमः, मध्यमः
Mantra with Swara
आकू॑त्यै प्र॒युजे॒ऽग्नये॒ स्वाहा॑ मे॒धायै॒ मन॑से॒ऽग्नये॒ स्वाहा॑ दी॒क्षायै॒ तप॑से॒ऽग्नये॒ स्वाहा॒ सर॑स्वत्यै पू॒ष्णेऽग्नये॒ स्वाहा॑। आपो॑ देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो॒ द्यावा॑पृथिवी॒ऽउरो॑ऽन्तरिक्ष। बृह॒स्पत॑ये ह॒विषा॑ विधेम॒ स्वाहा॑॥७॥

आकू॑त्या॒ इत्याऽकू॑त्यै। प्र॒युज॒ इति॑ प्र॒ऽयुजे॑। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। मे॒धायै॑। मन॑से। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। दी॒क्षायै॑। तप॑से। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। सर॑स्वत्यै। पू॒ष्णे। अ॒ग्नये॑। स्वाहा॑। आपः॑। दे॒वीः॒। बृ॒ह॒तीः॒। वि॒श्व॒शं॒भु॒व॒ इति॑ विश्वऽशंभुवः। द्यावा॑पृथिवी॒ऽइति द्यावा॑पृथिवी। उरो॒ऽइत्युरो॑। अ॒न्त॒रि॒क्ष॒। बृह॒स्पत॑ये। ह॒विषा॑। वि॒धे॒म॒। स्वाहा॑ ॥७॥

Mantra without Swara
आकूत्यै प्रयुजे ग्नये स्वाहा मेधायै मनसे ग्नये स्वाहा दीक्षायै तपसेग्नये स्वाहा सरस्वत्यै पूष्णेग्नये स्वाहा । आपो देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो द्यावापृथिवी उरो अन्तरिक्ष । बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा ॥

आकूत्या इत्याऽकूत्यै। प्रयुज इति प्रऽयुजे। अग्नये। स्वाहा। मेधायै। मनसे। अग्नये। स्वाहा। दीक्षायै। तपसे। अग्नये। स्वाहा। सरस्वत्यै। पूष्णे। अग्नये। स्वाहा। आपः। देवीः। बृहतीः। विश्वशंभुव इति विश्वऽशंभुवः। द्यावापृथिवीऽइति द्यावापृथिवी। उरोऽइत्युरो। अन्तरिक्ष। बृहस्पतये। हविषा। विधेम। स्वाहा॥७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे हम (आकूत्यै) उत्साह प्रप्ति के लिए (प्रयुजे) उत्तम-गुणों से युक्त करने वाले धर्माचरण के लिये (अग्नये) अग्नि को प्रदीप्त करने के लिए, (स्वाहा) वेदवाणी के प्रचार के लिए, (सरस्वत्यै) विद्या और उत्तम-शिक्षा से
युक्त वाणी के लिए, (पूष्णे) पुष्टि प्राप्त करने के लिए, (बृहस्पतये) वाणी और आकाश आदि के स्वामी जगदीश्वर के लिए, (अग्नये) जाठराग्नि को शुद्ध करने के लिए, (स्वाहा) सच्ची वाणी बोलने के लिए, (मेधायै) बुद्धि को बढ़ाने के लिए, (मनसे) विज्ञान वृद्धि के लिए (अग्नये) विद्युत् विद्या को ग्रहण करने के लिए, (स्वाहा) परोपकार करने वाली क्रिया के लिए, (दीक्षाय) धर्म-शास्त्र के अनुसार आचरण की रीति के लिए, (तपसे) प्रताप प्राप्ति के लिए, (अग्नये) कारणरूपता के लिए, (स्वाहा) पढ़ने-पढ़ाने की विद्या के लिए जो [बृहतीः] महान् गुणों से युक्त (विश्वशम्भुवः) सब को सुख शान्ति देने वाला [देवी:] दिव्य गुणों से सम्पन्न [आपः] प्राण व जलों की प्राप्ति के लिए (स्वाहा) सत्यभाषण युक्त वाणी से यज्ञ करना चाहिए। और जो (द्यावापृथिवी) भूमि और प्रकाश (उरो) बहुत सुख देने वाले (अन्तरिक्ष) आकाश में स्थित यज्ञ है उसको तथा (स्वाहा) संगत, प्यारी, सुन्दर स्तुति युक्त वाणी को भी क्रिया से तथा (हविषा) यज्ञ सामग्री एवं सत्य के प्रति प्रेम भावना से शुद्ध (विधेम) करते हैं, वैसे तुम भी किया करो ॥ ४।७।
Essence
यज्ञ के अनुष्ठान के बिना उत्साह, मेधा, सत्य वाणी, दीक्षा, तप, धर्माचरण, विद्या और पुष्टि की सिद्धि सम्भव नहीं है। और निश्चय है कि इनके बिना कोई भी परमेश्वर की आराधना नहीं कर सकता। इसलिए सब मनुष्य यज्ञ के अनुष्ठान से सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त करें ।। ४ । ७ ।।
Subject
किसलिए उस यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए, यह उपदेश किया है।।
Refrences
(देवीः) यहाँ 'वा छन्दसि' [अ० ६। १। १०२] सूत्र से 'जस्' प्रत्यय को पूर्व सवर्ण दीर्घ है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३ । १ । ४ । ६-१५) में की गई है ॥ ४ । ७ ॥
Commentary Essence
१. यज्ञानुष्ठान का प्रयोजन--यज्ञ के अनुष्ठान से मनुष्य को उत्साह, उत्तम गुणों से संयुक्त करने वाला धर्माचरण, अग्निविद्या, वेदवाणी का प्रचार, विद्या-सुशिक्षा से युक्त वाणी, पुष्टि व परमेश्वर की प्राप्ति, जाठराग्नि की शुद्धि, सत्यभाषण में प्रवृत्ति, बुद्धि की वृद्धि, विज्ञान की वृद्धि, विद्युत् विद्या की प्राप्ति, परोपकार में प्रवृत्ति, तप का सामर्थ्य, अध्ययन-अध्यापन की विद्या, महान् दिव्य गुणों से युक्त सब के लिए सुखदायक प्राण व जलों की प्राप्ति, तथा सङ्गत, प्रिय, उत्तम वाणी की प्राप्ति होती है। इन्हीं गुणों से मनुष्य परमेश्वर की आराधना करने में समर्थ होता है ।।
२. स्वाहा शब्द के अर्थ-- १. वेदवाणी का प्रचार । २. सत्य भाषण में प्रवृत्ति । ३. परोपकार करना । ४. अध्ययन- अध्यापन की विद्या । ५. वाणी । ६. सङ्गत, प्रिय, सुन्दर, ईश्वर की स्तुति करने वाली वाणी ॥ ४ ।। ७ ।।