Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 3

37 Mantra
4/3
Devata- मेघो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराट् अनुष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
म॒हीनां॒ पयो॑ऽसि वर्चो॒दाऽअ॑सि॒ वर्चो॑ मे देहि। वृ॒त्रस्या॑सि क॒नीन॑कश्चक्षु॒र्दाऽअ॑सि॒ चक्षु॑र्मे देहि॥३॥

म॒हीनाम्। पयः॑। अ॒सि॒। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। अ॒सि॒। वर्चः॑। मे॒। दे॒हि॒। वृ॒त्रस्य॑। अ॒सि॒। क॒नीन॑कः। च॒क्षु॒र्दा इति॑ चक्षुः॒दाः। अ॒सि॒। चक्षुः॑। मे॒। दे॒हि॒ ॥३॥

Mantra without Swara
महीनांम्पयोसि वर्चादा असि वर्चा मे देहि वृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा असि चक्षुर्मे देहि ॥

महीनाम्। पयः। असि। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। असि। वर्चः। मे। देहि। वृत्रस्य। असि। कनीनकः। चक्षुर्दा इति चक्षुःदाः। असि। चक्षुः। मे। देहि॥३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो (महीनाम्) पृथिवियों के (पथः) रस का निमित्त (असि) है, (वर्चोदाः) दीप्ति का देने वाला (असि) है, जो (मे) मुझे (वर्च:) प्रकाश (देहि) देता है, जो (वृत्रस्य) मेघ को (कनीनक:) प्रकाशित करने वाला [असि] है, और जो (चक्षुर्दा:) देखने के साधन चक्षु को देने वाला [असि] है, वह सूर्य (मे) मेरे लिए (चक्षुः) नेत्र व्यवहार को (देहि) प्रदान करता है।
।। ४।३।।
Essence
सूर्य के प्रकाश के बिना वर्षा की उत्पत्ति तथा आँखों से देखना रूप व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकता, अतः जिसने यह सूर्य रचा है, सब मनुष्य उस ईश्वर को कोटिशः धन्यवाद देवें ।। ४ । ३ ।।
भा० पदार्थ:-- वृत्रस्य कनीनकः=वृष्ट्युत्पादकः। चक्षुर्दाः-चक्षुर्व्यवहारसाधकः।।
Subject
इस जलसमूह से उत्पन्न हुए मेघ का क्या निमित्त है ।।
Refrences
(महीनाम्) 'मही' शब्द निघं० (१ । १) में पृथिवी नामों में पढ़ा है। (असि) अस्ति । इस मन्त्र में सर्वत्र 'असि' पद पर व्यत्यय है। (कनीनकः) यह शब्द 'कनी' धातु से बहुल करके औणादिक 'ईन' प्रत्यय और स्वार्थ में 'कन्' प्रत्यय करने पर सिद्ध होता है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३। १।३। ९-१५) में की गई है ।। ४ । ३ ।।
Commentary Essence
जलसमूह से उत्पन्न मेघ का निमित्त क्या है? --पृथिवीस्थ पदार्थों में रस उत्पन्न करने वाला, दीप्ति देने वाला, चक्षु व्यवहार को सिद्ध करने वाला, सूर्य जलसमूह से उत्पन्न मेघ का निमित्त है। और जिसने ऐसे अद्भुत गुणों वाला सूर्य रचा है उस ईश्वर का करोड़ों बार धन्यवाद है ।। ४ । ३ ।।