Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 28

37 Mantra
4/28
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- साम्नी बृहती,साम्नी उष्णिक्, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
परि॑ माग्ने॒ दुश्च॑रिताद् बाध॒स्वा मा॒ सुच॑रिते भज। उदायु॑षा स्वा॒युषोद॑स्थाम॒मृताँ॒२ऽअनु॑॥२८॥

परि॑। मा॒। अ॒ग्ने॒। दुश्च॑रिता॒दिति॒ दुःऽच॑रितात्। बा॒ध॒स्व॒। आ। मा॒। सुच॑रित॒ इति॒ सुऽच॑रिते। भ॒ज॒। उत्। आयु॑षा। स्वा॒युषेति॑ सुऽआ॒युषा॑। उत्। अ॒स्था॒म्। अ॒मृता॑न्। अनु॑ ॥२८॥

Mantra without Swara
परि माग्ने दुश्चरिताद्बाधस्वा मा सुचरिते भज । उदायुषा स्वायुषोदस्थाममृताँ अनु ॥

परि। मा। अग्ने। दुश्चरितादिति दुःऽचरितात्। बाधस्व। आ। मा। सुचरित इति सुऽचरिते। भज। उत्। आयुषा। स्वायुषेति सुऽआयुषा। उत्। अस्थाम्। अमृतान्। अनु॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) विज्ञानस्वरूप दयालु जगदीश्वर! आपकी कृपा से जिस कर्म के द्वारा (स्वायुषा) सुन्दर जीवन के साथ और (आयुषा) इस जीवन से (अमृतान्) मोक्ष को प्राप्त, सदेह और विदेह विद्वानों को अथवा मोक्ष के आनन्द रूप उत्तम-भोग एवं अमृतमय भोगों को (उदस्थाम्) उत्कृष्ट रीति से प्राप्त करूँ ।
उससे (मा) मुझे संयुक्त करके (दुश्चरितात्) बुरे आचरण से ([परि] उत्-बाधस्व) सब ओर से हटा और उससे अलग करके (मा) मुझे (सुचरिते) उत्तम धर्म युक्त व्यवहार में (अनु-आ-भज) अनुकूलतापूर्वक सब ओर से स्थापित कर ।। ४ । २८ ।।
Essence
मनुष्यों से अधर्मत्याग और धर्म को ग्रहण करने के लिये सच्चे भाव से प्रार्थना किया हुआ यह परमात्मा जैसे इन्हें अधर्म से हटा कर धर्म में शीघ्र प्रवृत्त कर देता है वैसे स्वयं भी सारा जीवन धर्माचरण में लगा कर मनुष्य संसारसुख और मुक्ति-सुखों का सेवन करें ॥ ४ ॥ २८ ॥
Subject
सब मनुष्यों को उचित है कि सब करने योग्य उत्तम कर्मों के आरम्भ मध्य और सिद्ध होने पर परमेश्वर की प्रार्थना सदा किया करें, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३ । ३ । ३ । १३-१४) में की गई है ।। ४ । २८ ।।
Commentary Essence
सब शुभकर्मों के अनुष्ठान में ईश्वर प्रार्थना--सब मनुष्य अधर्म का त्याग और धर्म का ग्रहण करने के लिये सच्ची भावना से इस प्रकार ईश्वर से प्रार्थना करें कि हे विज्ञानस्वरूप, दयालु, जगदीश्वर! आप ऐसी कृपा कीजिए कि मैं अपने जीवनकाल में अमृत अर्थात् मोक्ष को प्राप्त, सदेह और विदेह विद्वानों को एवं अमृतमय भोगों को प्राप्त करूँ। इन से आप मुझे संयुक्त कीजिये। दुष्टाचरण रूप अधर्म से हटाकर उत्तम आचरण रूप धर्म में शीघ्र प्रवृत्त कीजिये। जिससे मैं आजीवन धर्म का ही आचरण करके संसार सुख और मुक्ति सुख का सेवन करूँ ॥ ४ ॥ २८ ॥