Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 22

37 Mantra
4/22
Devata- वाग्विद्युतौ देवते Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- ब्राह्मी पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अदि॑त्यास्त्वा मू॒र्द्धन्नाजि॑घर्मि देव॒यज॑ने पृथि॒व्याऽइडा॑यास्प॒दम॑सि घृ॒तव॒त् स्वाहा॑। अ॒स्मे र॑मस्वा॒स्मे ते॒ बन्धु॒स्त्वे रायो॒ मे रायो॒ मा व॒यꣳ रा॒यस्पोषे॑ण॒ वियौ॑ष्म॒ तातो॒ रायः॑॥२२॥

अदि॑त्याः। त्वा॒। मू॒र्द्धन्। आ। जि॒घर्मि॒। दे॒व॒यज॑न॒ इति॑ देव॒ऽयज॑ने। पृ॒थि॒व्याः। इडा॑याः। प॒दम्। अ॒सि॒। घृ॒तव॒दि॑ति घृ॒तऽव॑त्। स्वाहा॑। अ॒स्मे॑ऽइत्य॒स्मे। र॒म॒स्व॒। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे। ते॒। बन्धुः॑। त्वेऽइति॒ त्वे। रायः॑। मेऽइति॒ मे। रायः॑। मा। व॒यम्। रा॒यः। पोषे॑ण। वि। यौ॒ष्म॒। तोतः॑। रायः॑ ॥२२॥

Mantra without Swara
अदित्यास्त्वा मूर्धन्ना जिघर्मि देवयजने पृथिव्या इडायास्पदमसि घृतवत्स्वाहा । अस्मे रमस्वास्मे ते बन्धुस्त्वे रायो मे रायो मा वयँ रायस्पोषेण वि यौष्म तोतो रायः ॥

अदित्याः। त्वा। मूर्द्धन्। आ। जिघर्मि। देवयजन इति देवऽयजने। पृथिव्याः। इडायाः। पदम्। असि। घृतवदिति घृतऽवत्। स्वाहा। अस्मेऽइत्यस्मे। रमस्व। अस्मेऽइत्यस्मे। ते। बन्धुः। त्वेऽइति त्वे। रायः। मेऽइति मे। रायः। मा। वयम्। रायः। पोषेण। वि। यौष्म। तोतः। रायः॥२२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान् मनुष्य ! तू जैसे जो (देवयजने) विद्वानों के साथ सङ्ग करने वा इनको दान देने में (अदित्याः) अन्तरिक्ष के (पृथिव्याः) भूमि के मध्य में (इडायाः) स्तुति करने और खोजने योग्य वेदवाणी [मूर्द्धन्] शिर पर विद्यमान (स्वाहा) उत्तम हवन क्रिया से (घृतवत्) पुष्टि और दीप्ति करने वाले घृत के समान (पदम्) जानने प्राप्त करने योग्य वाणी और विद्युत् (असि) हैं, जिसको मैं (आ जिघर्मि) प्रदीप्त वा संचालित करता हूँ (त्वा) उसे तू भी प्रदीप्त वा संचालित कर।
जो (अस्मे) हम में रमण करती है वह तुम्हारे में भी (रमस्व) रमण करे। जिसे मैं रमण कराता हूँ उसे आप भी अपने में रमण कराओ ।
जो (अस्मे) हमारा (बन्धु) भाई है वह (ते) आपका भी होवे और जो (रायः) विद्यादि और सुवर्णादि धन समूह आपके पास है वह (मे) मेरे पास भी हो ।
(तोतः) जानने, प्राप्त करने और हिंसा के साधन आप जो (रायः) विद्या, धन आदि की समृद्धि को प्राप्त करते हो वह (मे) मुझ में भी हो, जो मुझ में हैं वे (त्वे) तुझमें भी हों। ये (रायः) विद्या, राज्य धन की समृद्धि हैं वे सबके सुख के लिए प्रयुक्त हों।
जैसे जानते, निश्चय करते एवं आचरण करते हुए तुम और हम (रायः) धन की (पोषेण) पुष्टि से कभी भी (मा वियौष्म) पृथक् न हों, वैसे सब होवें ।। ४ । २२ ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ॥ सब मनुष्य जो सत्य विद्या और धर्माचरण से शुद्ध वाणी और जो विद्या तथा क्रिया से प्रयोग में आई हुई विद्युदादि विद्या है उसका सबको उपदेश करके, ग्रहण करा, सुख-दुःख की व्यवस्था को समान जानकर, सब ऐश्वर्य परोपकार में लगा कर सदा सुखी रहें ।
ऐसा व्यवहार कभी न करें कि जिससे अपने वा दूसरे के ऐश्वर्य की कभी हानि होवे ॥ ४ । २२ ।।
Subject
फिर वे वाणी और बिजुली कैसी हैं, इस विषय का उपदेश किया है ॥
Refrences
(अदित्याः) अन्तरिक्षस्य । "अदितिरन्तरिक्षम्०" इत्यादि वेद मन्त्र से 'अदिति' शब्द से 'अन्तरिक्ष अर्थ गृहीत होता है। (इडायाः) 'इडा' शब्द निघं० (१ । ११) में वाणी-नामों में पढ़ा है। (अस्मे) अस्माकम् । यहाँ सर्वत्र 'सुपां सुलुक्०' [अ० ७ । १ । ३६] सूत्र से 'शे' आदेश है। (तोतः) यह शब्द गति-वृद्धि और हिंसा अर्थ वाली 'तु' धातु से बहुल करके औणादिक 'तन्' प्रत्यय करने पर सिद्ध होता है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३ । ३ । १ । १४-११) में की गई है ॥ ४ ॥ २२ ॥
Commentary Essence
१. वाणी और विद्युत् कैसी है--यह वेद-वाणी तथा विद्युत् विद्वानों के सङ्ग से तथा उनका दान आदि से सत्कार करके प्रकाश और भूमि पर सर्वत्र स्तुति करने के योग्य हैं, अन्वेषण करने के योग्य हैं। पुष्टिकारक होम क्रिया के समान जानने योग्य हैं तथा प्राप्त करने योग्य हैं। विद्वान् लोग चहुँ ओर इसका प्रदीपन और संचालन करते हैं। यह विद्वानों में रमण करती हैं। यह विद्वानों की बन्धु (भ्राता) हैं। और उन्हें विद्यादि तथा सुवर्ण आदि धन प्राप्त कराती हैं। विद्वान् लोग इन्हें जानकर तथा प्राप्त करके और दुष्ट जनों का इससे ताड़न करके विद्या और धन की समृद्धि को प्राप्त करते हैं। यह विद्वानों की विद्या और धन की समृद्धि सबके सुख के लिये प्रयुक्त होती है। इस प्रकार वाणी और विद्युत् की महिमा को जानने वाले, निश्चयवान् तथा आचरणशील विद्वान् कभी भी धन की पुष्टि से वञ्चित नहीं होते।
२. अलङ्कार--मन्त्र में वाचक शब्द लुप्त है, अतः वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि विद्वानों के समान अन्य जन भी वाणी तथा विद्युत् विद्या का उपदेश तथा ग्रहण करके ऐश्वर्य को प्राप्त कर उसे परोपकार में लगाकर सदा सुखी रहें तथा किसी के ऐश्वर्य की हानि न करें ।। ४ । २२ ।।