Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 20

37 Mantra
4/20
Devata- वाग्विद्युतौ देवते Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- साम्नी जगती,भूरिक् आर्षी उष्णिक् Swara- निषादः
Mantra with Swara
अनु॑ त्वा मा॒ता म॑न्यता॒मनु॑ पि॒ताऽनु भ्राता॒ सग॒र्भ्योऽनु॒ सखा॒ सयू॑थ्यः। सा दे॑वि दे॒वमच्छे॒हीन्द्रा॑य॒ सोम॑ꣳ रु॒द्रस्त्वा॑वर्त्तयत् स्वस्ति सोम॑सखा॒ पुन॒रेहि॑॥२०॥

अनु॑। त्वा॒। मा॒ता। म॒न्य॒ता॒म्। अनु॑। पि॒ता। अनु॑। भ्राता॑। सग॑र्भ्य॒ इति॒ सऽग॑र्भ्यः। अनु॑। सखा॑। सयू॑थ्य॒ इति॒ सऽयू॑थ्यः। सा। दे॒वि॒। दे॒वम्। अच्छ॑। इ॒हि॒। इन्द्रा॑य। सोम॑म्। रु॒द्रः। त्वा॒। आ। व॒र्त्त॒य॒तु॒। स्व॒स्ति॑। सोम॑स॒खेति॒ सोम॑ऽसखा। पुनः॑। आ। इ॒हिः॒ ॥२०॥

Mantra without Swara
अनु त्वा माता मन्यतामनु पितानु भ्राता सगर्भ्या नु सखा सयूथ्यः । सा देवि देवमच्छेहीन्द्राय सोमँ रुद्रस्त्वा वर्तयतु स्वस्ति सोमसखा पुनरेहि ॥

अनु। त्वा। माता। मन्यताम्। अनु। पिता। अनु। भ्राता। सगर्भ्य इति सऽगर्भ्यः। अनु। सखा। सयूथ्य इति सऽयूथ्यः। सा। देवि। देवम्। अच्छ। इहि। इन्द्राय। सोमम्। रुद्रः। त्वा। आ। वर्त्तयतु। स्वस्ति। सोमसखेति सोमऽसखा। पुनः। आ। इहिः॥२०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्य ! जैसे (रुद्रः) परमेश्वर अथवा चवालीस (४४) वर्ष ब्रह्मचर्य पालन करने वाला विद्वान् (वर्तयतु) प्रेरणा करे, जिस वाणी, विद्युत् और (सोमम्) उत्तम पदार्थों को (देवम्) परमेश्वर वा विद्या से युक्त शुद्ध व्यवहार को (स्वस्ति) उत्तम सुख को जिस (इन्द्राय) परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए (आवर्त्तयतु) सब प्रकार प्रेरणा करे, और जिससे (सोमसखा) परमेश्वर वा सोम विद्या को जानने वाला मनुष्य मैत्री करता है वह [सा] पूर्वोक्त (देवि) प्रकाशमान वाणी और विद्युत् (देवम्) परमेश्वर वा विद्या युक्त शुद्ध व्यवहार वाले विद्वान् को प्राप्त होती है वैसे तू उसे (पुनः) बार-बार (अच्छ) उत्तम रीति से (इहि) जान वा प्राप्त कर ।
इस विद्या को ग्रहण करने के लिए [त्वा] तुझे (माता) तेरी जननी (अनुमन्यताम् ) स्वयं समझावे एवं स्वीकृति देवे (पिता) तेरा पिता (अनुमन्यताम्) शिक्षा और स्वीकृति देवे, (सगर्भ्यः) उसी गर्भ से उत्पन्न हुआ अर्थात् सगा (भ्राता) भाई (अनुमन्यताम्) बतलावे और स्वीकृति देवे। (सयूथ्यः) उसी यूथ अर्थात् समूह में रहने वाला (सखा) मित्र ( अनुमन्यताम् ) तेरे अनुकूल होकर तुझे कहे और स्वीकृति देवे और तू (त्वा) इस विद्या को बार-बार पुरुषार्थ करके (ऐहि) सब ओर से प्राप्त कर ।। ४ । २० ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है । सब मनुष्य परस्पर ऐसे व्यवहार करें--जैसे धर्मात्मा विदुषी माता, धर्मात्मा विद्वान् पिता, भाई और मित्र आदि सत्य व्यवहार में प्रवृत्त रहें वैसे पुत्र आदि भी उनका अनुकरण करें ।
और--जैसे विद्वान् धार्मिक पुत्र आदि धर्मयुक्त व्यवहार में प्रवृत्त हों वैसे ही माता आदि भी उनका अनुसरण करें, इस प्रकार सब परस्पर बर्ताव करके आनन्द में रहें ।। ४ । २० ।।
Subject
फिर वह वाणी और बिजुली कैसी हैं, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
(अनु) निरु० (१ । ३) में 'अनु' उपसर्ग का अर्थ "सादृश्य और अपर भाव (पश्चात्)" है (सगर्भ्यः) यह शब्द 'सगर्भसयूथसनुताद्यन् ( अ. ४ । ४ । ११४) सूत्र से 'सगर्भ' शब्द से 'भव' अर्थ में 'यन्' प्रत्यय करने पर सिद्ध है। (स्वस्ति) यह शब्द निघं० (५ । ५) में पद-नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३ । २ । ४ । २०–२१) में की गई है ।। ४ । २० ।।
Commentary Essence
१. वाणी कैसी है--वाणी की प्राप्ति के लिये रुद्र अर्थात् परमेश्वर अथवा ४४ वर्ष का रुद्र विद्वान् ब्रह्मचारी प्रेरणा करता है तथा उत्तम पदार्थ, परमेश्वर, विद्यायुक्त शुद्ध व्यवहार, उत्तम सुख और परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए भी प्रेरणा करता है। परमेश्वर और सोमविद्या का विद्वान् जिसके सखा हैं, वह हार्दिक भावों को प्रकाशित करने वाली वाणी परमेश्वर को प्राप्त कराती है, विद्यायुक्त शुद्ध व्यवहार से सुभूषित करती है।
२. विद्युत कैसी है--वाणी के समान विद्युत् विद्या की प्राप्ति के लिए भी रुद्र अर्थात् परमेश्वर अथवा विद्वान् रुद्र ब्रह्मचारी प्रेरणा देता है। तथा उत्तम पदार्थ, परमेश्वर, विद्यायुक्त शुद्ध व्यवहार, उत्तम सुख और परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये भी प्रेरणा करता है। परमेश्वर और सोमविद्या का ज्ञाता विद्वान् विद्युत्-विद्या के मित्र हैं। यह विद्युत् सब पदार्थों को प्रदीप्त करने वाला है। परमेश्वर और विद्यायुक्त शुद्ध व्यवहार की प्राप्ति का साधन है।
३. वाणी और विद्युत्-विद्या की प्राप्ति के लिए अनुमति-- इस वाणी तथा विद्युत् विद्या को ग्रहण करने के लिये धर्मात्मा विदुषी माता, धार्मिक विद्वान् पिता, भाई तथा मित्र आदि सभी लोग अपने पुत्र आदिकों को स्वीकृति प्रदान करें ।
४. अलङ्कार--मन्त्र में उपमावाचक 'इव' आदि शब्द लुप्त हैं इसलिये वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे धर्मात्मा विदुषी माता, तथा धार्मिक विद्वान् पिता आदि विद्या प्राप्ति रूप धर्मयुक्त सत्य व्यवहार में प्रवृत्त हों, वैसे पुत्र आदि भी प्रवृत्त रहा करें और जैसे पुत्र आदि धर्मयुक्त व्यवहार में प्रवृत्त रहें वैसे माता-पिता आदि भी धर्म-व्यवहार में प्रवृत्त रहा करें ।। ४ । २० ।।