Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 16

37 Mantra
4/16
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्स ऋषिः Chhand- भूरिक् आर्षी पङ्क्ति, Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने व्रत॒पाऽअ॑सि दे॒वऽआ मर्त्ये॒ष्वा। त्वं य॒ज्ञेष्वीड्यः॑। रास्वेय॑त्सो॒मा भूयो॑ भर दे॒वो नः॑ सवि॒ता वसो॑र्दा॒ता वस्व॑दात्॥१६॥

त्वम्। अ॒ग्ने॒। व्र॒त॒पा॒ इति॑ व्रत॒ऽपाः। अ॒सि॒। दे॒वः। आ। मर्त्त्ये॑षु। आ। त्वम्। य॒ज्ञेषु॑। ईड्यः॑। रास्व॑। इय॑त्। सो॒म। आ। भूयः॑। भ॒र॒। दे॒वः। नः॒। स॒वि॒ता। वसोः॑। दा॒ता। वसु॑। अ॒दा॒त् ॥१६॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने व्रतपा असि देव आ मर्त्येष्वा । त्वँयज्ञेष्वीड्यः । रास्वेयत्सोमा भूयो भर देवो नः सविता वसोर्दाता वस्वदात् ॥

त्वम्। अग्ने। व्रतपा इति व्रतऽपाः। असि। देवः। आ। मर्त्त्येषु। आ। त्वम्। यज्ञेषु। ईड्यः। रास्व। इयत्। सोम। आ। भूयः। भर। देवः। नः। सविता। वसोः। दाता। वसु। अदात्॥१६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) ऐश्वर्य के दाता (अग्ने) जगदीश्वर! जो (त्वम्) आप (मर्त्येषु) मरणधर्मा मनुष्यों में (व्रतपाः) सत्यभाषण, धर्माचरण आदि व्रतों का रक्षक ( सविता) सब जगत् के उत्पादक हो तथा (यज्ञेषु) सत्कार, उपासना आदि में तथा अग्निहोत्रादि में (ईड्यः) स्तुति के योग्य (देव:) प्रकाशक देव (असि) हो। वह आप (नः) हमारे लिये (वसोः) धन को (दाता) प्राप्त कराने वाले होकर (वसु) विज्ञान-धन ([आ-अदात्) सब ओर से देते हो वह [देवः] दाता (भूयः) अत्यधिक (वसु) धन (आरास्व) सब ओर से दीजिए (इयत्) प्राप्त कराते हुए (त्वम्) आप इनको हमारे लिए (आभर) धारण करते हो। यह मन्त्र का पहला अर्थ है ।
जो (अग्ने) अग्नि है [त्वम्] वह (मर्त्येषु) मानवीय कार्यों में (व्रतपाः) सत्यभाषण, धर्माचरण आदि व्रतों का रक्षक (सविता ) सब जगत् का प्रेरक है वह (यज्ञेषु) शिल्प कार्यों में (ईड्यः) पूज्य अर्थात् प्रयोक्तव्य (सोमः) ऐश्वर्य का निमित्त (देव:) प्रकाशक देव [असि] है [त्वम्] वह (नः) हमें (वसो:) धन का (दाता) प्रदाता, धन को (इयत्) प्राप्त कराता हुआ [देवः] दाता अग्नि [वसु] धन [आ-अदात्] प्रदान करता है, (भूयः) अत्यधिक सब कार्यों में (आरास्व) सबओर से देता है तथा (आभर) सब ओर से सुखों से पुष्ट करता है । यह मन्त्र का दूसरा अर्थ है ॥ ४। १६ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है। सब मनुष्य सत्यस्वरूप, पूजा के योग्य, सब जगत् के उत्पादक, सकल सुखदाता परमेश्वर की ही उपासना करके सुखी रहें।
और इसी प्रकार कार्य सिद्धि के लिए भौतिक अग्नि का प्रयोग करके सब सुखों को प्राप्त करें ।। ४ । १६ ।।
Subject
फिर वे ईश्वर और भौतिक अग्नि कैसे हैं, इस विषय का उपदेश किया है ॥
Refrences
(असि) अस्ति। यहाँ पक्ष में पुरुष-व्यत्यय है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३ । २ । २ । २४-२५) में की गई है ।। ४ । १६ ।।
Commentary Essence
१. अग्नि (ईश्वर) कैसा है--अग्नि अर्थात् ईश्वर ऐश्वर्य का दाता, सत्य व्रतों का पालन करने वाला होने से सत्यस्वरूप, सब जगत् का उत्पादक, स्तुति और पूजा के योग्य, सब सुखों का दाता और विज्ञान धन का देने वाला है। सब मनुष्य उक्त परमेश्वर की उपासना करके सुखी रहें ।
२. अग्नि (भौतिक) कैसा है--यह भौतिक अग्नि सत्य व्रतों का रक्षक, सब जगत् को प्रेरणा (गति) देने वाला, शिल्प यज्ञों में प्रयोग के योग्य, ऐश्वर्य प्राति का हेतु और धन का प्रापक है। इस भौतिक अग्नि का सब कार्यों में प्रयोग करके सब सुखों को प्राप्त करें ।।
३. अलङ्कार–यहाँ श्लेष अलङ्कार होने से अग्नि शब्द से ईश्वर और भौतिक अग्नि अर्थ का ग्रहण किया है ।। ४ । १६ ।।