Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 4 / Mantra 10

37 Mantra
4/10
Devata- यज्ञो देवता Rishi- आङ्गिरस ऋषयः Chhand- निचृत् आर्षी जगती,साम्नी त्रिष्टुप् Swara- निषादः
Mantra with Swara
ऊर्ग॑स्याङ्गिर॒स्यूर्ण॑म्रदा॒ऽऊर्जं॒ मयि॑ धेहि। सोम॑स्य नी॒विर॑सि॒ विष्णोः॒ शर्मा॑सि॒ शर्म॑ यज॑मान॒स्येन्द्र॑स्य॒ योनि॑रसि सुऽस॒स्याः कृ॒षीस्कृ॑धि। उच्छ्र॑यस्व वनस्पतऽऊ॒र्ध्वो मा॑ पा॒ह्यꣳह॑स॒ऽआस्य य॒ज्ञस्यो॒दृचः॑॥१०॥

ऊर्क्। अ॒सि॒। आ॒ङ्गि॒र॒सि॒। ऊर्ण॑म्रदा॒ इत्यूर्ण॑ऽम्रदाः। ऊर्ज॑म्। मयि॑। धे॒हि॒। सोम॑स्य। नी॒विः। अ॒सि॒। विष्णोः॑। शर्म॑। अ॒सि॒। शर्म॑। यज॑मानस्य। इन्द्र॑स्य। योनिः॑। अ॒सि॒। सु॒स॒स्या इति॑ सुऽस॒स्याः। कृ॒षीः। कृ॒धि॒। उत्। श्र॒य॒स्व॒। व॒न॒स्प॒ते॒। ऊ॒र्ध्वः। मा॒। पा॒हि॒। अꣳह॑सः। आ। अ॒स्य। य॒ज्ञस्य॑। उ॒दृच॒ इत्यु॒त्ऽऋचः॒ ॥१०॥

Mantra without Swara
ऊर्गस्याङ्गिरस्यूर्णम्रदा ऊर्जं मयि धेहि । सोमस्य नीविरसि विष्णोः शर्मासि शर्म यजमानस्येन्द्रस्य योनिरसि सुसस्याः कृषीस्कृधि । उच्छ्रयस्व वनस्पत ऊर्ध्वा मा पाह्यँहस आस्य यज्ञस्योदृचः ॥

ऊर्क्। असि। आङ्गिरसि। ऊर्णम्रदा इत्यूर्णऽम्रदाः। ऊर्जम्। मयि। धेहि। सोमस्य। नीविः। असि। विष्णोः। शर्म। असि। शर्म। यजमानस्य। इन्द्रस्य। योनिः। असि। सुसस्या इति सुऽसस्याः। कृषीः। कृधि। उत्। श्रयस्व। वनस्पते। ऊर्ध्वः। मा। पाहि। अꣳहसः। आ। अस्य। यज्ञस्य। उदृच इत्युत्ऽऋचः॥१०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वनस्पते) विद्या को प्रकाशित करने वालों के पालक विद्वान्! तुम जो (आङ्गिरसि) अग्नि आदि पदार्थों से सिद्ध (ऊर्णम्रदाः) ऊर्ण अर्थात् आच्छादन को हटाने वाली (ऊर्क्) पराक्रम और अन्न आदि प्रदान करने वाली शिल्प विद्या [असि] है और जो (ऊर्जम्) पराक्रम और अन्नादि को [मयि] मुझ शिल्पकार में [धेहि] धारण करती है तथा (सोमस्य) उत्पन्न हुए पदार्थों को (नीवि:) ढकने वाली (असि) है। और
जो (विष्णो:) शिल्पविद्या में व्यापक विद्वानों से प्राप्त करने योग्य है, (यजमानस्य) शिल्पक्रिया जानने वाले (इन्द्रस्य) परमैश्वर्य से युक्त मनुष्यों को [शर्म] सुख उत्पन्न करने वाली (योनिः) कारण [असि] है। और
जो (अस्य) इस प्रत्यक्ष अनुष्ठान किये जाने वाले (उदृचः) ऋचाओं को उत्तमता से प्रत्यक्ष करने वाले (विष्णोः) शिल्पविद्या में व्यापक विद्वान से प्राप्त करने योग्य है तथा (यज्ञस्य) शिल्प विद्या से साध्य यज्ञ के लिये (शर्म) सुखकारक [असि] है उस विद्या को (आधेहि) सब ओर से धारण करते हो।
(सुसस्याः) उत्तम-उत्तम धान्य आदि को उत्पन्न करने वाली तथा (कृषी:) भूमि का विलेखन करने वाली क्रियाओं को (कृधि) कर और करवा। (ऊर्ध्व:) ऊपर बैठे वा बैठाये हुए आप (उच्छ्रयस्व) मेरा सेवन अच्छी प्रकार करो। (सुसस्याः) उत्तम-उत्तम धान्य आदि उत्पन्न करने वाली तथा (कृषी:) भूमि का विलेखन करने वाली क्रियाओं से (अंहसः) पाप और उसके फल दुःख से ([मा] पाहि) मेरी रक्षा करो। विमान आदि यानों में जो [वनस्पते] वृक्ष की शाखा ऊपर रखी जाती है उसका भी (उच्छ्रयस्व) उत्तम रीति से सेवन करो ।। ४ । १० ।।
Essence
मनुष्य विद्वानों से शिल्पविद्या का साक्षात्कार करके और इसका प्रचार कर सब मनुष्यों को समृद्ध बनावें ।। ४ । १० ।।
Subject
वह शिल्पविद्या यज्ञ कैसा है ।।
Refrences
(असि) अस्ति । इस मन्त्र में 'असि' पद पर सर्वत्र व्यत्यय है । (नीवि:) यह शब्द 'नौ व्योर्यलोपः’ (उणा० ४ । १४१) सूत्र से संवरण-अर्थ वाली 'व्येञ्' धातु से 'इण्' प्रत्यय करने और उसके 'डित्' होने से आकार का लोप होकर सिद्ध होता है। यहाँ धातु का ‘य’ लोप इसी सूत्र तथा पूर्वपद को दीर्घ है। (कृषीस्कृधि) यहाँ 'कः करत् करतिः' (अ० ८ । ३ । ५०) सूत्र से विसर्ग को सकार आदेश है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (३ । २ । १ । १४-३५) में की गई है ।। ४ । १० ।।
Commentary Essence
शिल्पविद्या रूपी यज्ञ कैसा है--अग्नि आदि से सिद्ध होने वाला, अज्ञान के आच्छादन को हटाने वाला, पराक्रम और अन्न आदि को देने वाला, उत्पन्न हुये सब पदार्थों को नियम में बांधने वाला है। विद्या-प्रकाशकों के स्वामी विद्वान् लोग शिल्पी जनों में इस शिल्प-यज्ञ का आधान करते हैं। यह शिल्पविद्या इसके पारंगत विद्वानों से प्राप्य है। स्वयं परमैश्वर्य से युक्त तथा अन्यों को परमैश्वर्य से युक्त करने वाले शिल्प क्रिया के ज्ञाता विद्वानों के लिए यह सुख का साधन है ।
इस शिल्प विद्या से उत्तम धान्य आदि देने वाले कृषि आदि कर्मों को करें क्योंकि कृषि आदि कर्म पाप और उसके दुःख रूप फल से रक्षा करते हैं। शिल्पविद्या के द्वारा विमान आदि में स्थापित की हुई वनस्पति (लकड़ी से बने यन्त्र) का सेवन करें, उनसे उपयोग लेवें ।। ४ । १० ।।