Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 8

63 Mantra
3/8
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सर्पराज्ञी कद्रूर्ऋषिः Chhand- गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्रि॒ꣳश॒द्धाम॒ विरा॑जति॒ वाक् प॑त॒ङ्गाय॑ धीयते। प्रति॒ वस्तो॒रह॒ द्युभिः॑॥८॥

त्रि॒ꣳशत्। धाम॑। वि। रा॒ज॒ति॒। वाक्। प॒त॒ङ्गाय॑। धी॒य॒ते॒। प्रति॑। वस्तोः॑। अह॑। द्युभि॒रिति॒ द्युऽभिः॑ ॥८॥

Mantra without Swara
त्रिँशद्धाम विराजति वाक्पतङ्गाय धीयते । प्रति वस्तोरह द्युभिः ॥

त्रिꣳशत्। धाम। वि। राजति। वाक्। पतङ्गाय। धीयते। प्रति। वस्तोः। अह। द्युभिरिति द्युऽभिः॥८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो अग्नि (द्युभिः) प्रकाश आदि गुण विशेषों से (प्रतिवस्तोः) प्रतिदिन ( त्रिंशत् ) पृथिवी आदि तैंतीस जो वसु आदि देवों में पढ़े गये हैं उनमें से अन्तरिक्ष, आदित्य और अग्नि इन तीनों को छोड़कर तीस (धाम ) धामों को (विराजति) विशेषतया प्रकाशित करता है।

उस (पतङ्गाय) पतन-पातन आदि गुणों से प्रकाशित एवं गतिशील अग्नि के लिये (प्रतिवस्तोः) प्रतिदिन विद्वान् लोग (अह) संयम से (वाक्) वाणी को [धयते] धारण करें अर्थात् उक्त अग्नि के गुणों का उपदेश करें ॥ ३ ॥ ८ ॥
Essence
जो वाणी प्राणयुक्त शरीर में स्थित विद्युत् नामक अग्नि के द्वारा नित्य प्रकाशित की जाती है,

उस अग्नि के गुणों को प्रकाशित करने के लिये विद्वान् लोग उस वाणी का उपदेश और श्रवण नित्य किया करें ॥ ३ ॥८॥
Subject
फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है।
Refrences
(धाम) धामानि । यहाँ'सुपां सुलुक्॰ [अ० ७ ।१।३९ ] से 'शस' प्रत्यय का लुक् है। (राजति) यहाँणिच् का अर्थ अन्तर्निहित है। (वाक्) 'वाक्' शब्द निघं० ( १ । ११) में वाणी नामों में पढ़ा है। (वस्तोः) 'वस्तो:' शब्द निघं० (१ । ९) में दिन नामों में पढ़ा है। (अह) निरु० (१ । ५) के अनुसार 'अह' शब्द का अर्थ विनिग्रह (नियमन) है (द्युभिः) निरु० ( १३ ।१५) के अनुसार प्रकाश करने वाली सूर्य की किरणों का नाम 'द्यु' है ।  ३। ॥८॥
Commentary Essence
अग्नि (भौतिक) कैसा है— यह विद्युत् रूप भौतिक अग्नि अपने प्रकाश आदि गुणों से पृथिवी आदि तीस धामों को प्रकाशित करने वाला, गतिशील तथा विद्वानों की वाणी से नित्य उपदेश करने के योग्य है ॥