Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 50

63 Mantra
3/50
Devata- इन्द्रो देवता Rishi- और्णवाभ ऋषिः Chhand- भूरिक् अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
दे॒हि मे॒ ददा॑मि ते॒ नि मे॑ धेहि॒ नि ते॑ दधे। नि॒हारं॑ च॒ हरा॑सि मे नि॒हारं॒ निह॑राणि ते॒ स्वाहा॑॥५०॥

दे॒हि। मे॒। ददा॑मि। ते॒। नि। मे॒। धे॒हि॒। नि। ते॒। द॒धे॒। नि॒हार॒मिति॑ नि॒ऽहार॑म्। च॒। हरा॑सि। मे॒। नि॒हार॒मिति॑ नि॒ऽहार॑म्। नि। ह॒रा॒णि॒। ते॒। स्वाहा॑ ॥५०॥

Mantra without Swara
देहि मे ददामि ते नि मे धेहि नि ते दधे । निहारञ्च हरासि मे निहारन्निहराणि ते स्वाहा ॥

देहि। मे। ददामि। ते। नि। मे। धेहि। नि। ते। दधे। निहारमिति निऽहारम्। च। हरासि। मे। निहारमिति निऽहारम्। नि। हराणि। ते। स्वाहा॥५०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मित्र ! आप जैसे (स्वाहा) सत्यवाणी कहता है, उसके अनुसार (मे) मुझे यह (देहि ) प्रदान कर और (ते) तुझे यह मैं (ददामि) देता हूँ।

 आप (मे) मेरी इस वस्तु को (निधेहि) धारण करो और मैं (ते) आपकी इस वस्तु को (निदधे ) धारण करता हूँ।

  आप (मे) मुझे (निहारम्) मूल्य से खरीदने योग्य एवं नितान्त ग्रहण करने योग्य वस्तु को (हरासि) प्रदान करो। मैं (ते) आप के लिए (निहारम्) पदार्थ का मूल्य (निहराणि) प्रदान करता हूँ ।। ३ । ५० ।।
Essence
सब मनुष्य देना, लेना, अमानत  (निःक्षेप), धरोहर (उपविधि) आदि व्यवहार सत्यतापूर्वक ही करें। जैसे किसी ने कहा कि यह आपने देनी है वा नहीं ? यदि वह यह कहे कि देता हूँ अथवा दूंगा तो वैसा ही आचरण करें।

  किसी ने कहा कि मेरी यह वस्तु आप अपने पास रखो, जब मुझे चाहिये तब दे देना, इसी प्रकार मैं आप की यह वस्तु रखता हूँ, जब आप आओगे तब दे दूंगा अथवा आपके पास आ जाऊँगा, आप ले लेना, अथवा मेरे पास आ जाना इत्यादि सब व्यवहार सत्य वाणी  से करें ।

  इन सत्य व्यवहारों के बिना किसी की प्रतिष्ठा और कार्यसिद्धि नहीं होती तथा प्रतिष्ठा और कार्य सिद्धि के बिना कोई निरन्तर सुख को प्राप्त नहीं कर सकता ।। ३ । ५० ।।
Subject
अब सब आश्रमों के व्यवहारों का उपदेश किया जाता है ॥
Refrences
(हरासि) यहाँ लेट् लकार का प्रयोग है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ । ५ । ३ । १९-२० ) में की गई है । ३ । ५० ।।
Commentary Essence
सब आश्रमों का व्यवहार-- ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी सभी लोग आपस के देन-लेन के व्यवहार को सत्यतापूर्वक करके आनन्द को प्राप्त करें ।। ३ । ५० ।।
Elsewhere Availablity
महर्षि ने इस मन्त्र की व्याख्या ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका (गृहाश्रम विषय) में इस प्रकार की है--“परमेश्वर उपदेश करता है कि (देहि मे०) जो सामाजिक नियमों की व्यवस्था के अनुसार ठीक चलना है यही गृहस्थ की परम उन्नति का कारण है जो वस्तु किसी से लेवें अथवा देवें सो भी सत्य व्यवहार के साथ करें (नि मे धेहि निते दधे) अर्थात् मैं तेरे साथ यह काम करूंगा और तू मेरे साथ ऐसा करना ऐसे व्यवहार को भी सत्यता से करना चाहिये (निहारं च हरासि मे नि०) यह वस्तु मेरे लिए तू दे वा तेरे लिए मैं दूँगा इसको भी यथावत् पूरा करें अर्थात् किसी प्रकार का मिथ्या व्यवहार किसी से न करें। इस प्रकार गृहस्थ लोगों के सब व्यवहार सिद्ध होते हैं क्योंकि जो गृहस्थ विचारपूर्वक सबके हितकारी काम करते हैं उनकी सदा उन्नति होती है ।। १० ।।