Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 40

63 Mantra
3/40
Devata- अग्निर्देवता Rishi- आसुरिर्ऋषिः Chhand- निचृत् अनुष्टुप्, Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒यम॒ग्निः पु॒री॒ष्यो रयि॒मान् पु॑ष्टि॒वर्ध॑नः। अग्ने॑ पुरीष्या॒भि द्यु॒म्नम॒भि सह॒ऽआय॑च्छस्व॥४०॥

अ॒यम्। अ॒ग्निः। पु॒री॒ष्यः᳖। र॒यि॒मानिति॑ रयि॒ऽमान्। पु॒ष्टि॒वर्ध॑न॒ इति॑ पुष्टि॒ऽवर्ध॑नः। अ॒ग्ने। पु॒री॒ष्य॒। अ॒भि। द्यु॒म्नम्। अ॒भि। सहः॑। आ। य॒च्छ॒स्व॒ ॥४०॥

Mantra without Swara
अयमग्निः पुरीष्यो रयिमान्पुष्टिवर्धनः । अग्ने पुरीष्याभि द्युम्नमभि सह आ यच्छस्व ॥

अयम्। अग्निः। पुरीष्यः। रयिमानिति रयिऽमान्। पुष्टिवर्धन इति पुष्टिऽवर्धनः। अग्ने। पुरीष्य। अभि। द्युम्नम्। अभि। सहः। आ। यच्छस्व॥४०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (पुरीष्य) सुख से भरपूर गुणों में श्रेष्ठ (अग्ने) विद्वन् ! एवं सब उत्तम पदार्थों के प्रदाता ईश्वर! जो (अयम्) यह उपदिश्यमान (पुरीष्यः) तृप्त करने वाले गुणों में उत्तम (रयिमान्) प्रशस्त धनों से युक्त (पुष्टिवर्द्धनः) पुष्टि को बढ़ाने वाला (अग्निः) पूर्वोक्त भौतिक अग्नि है, उससे (अभिद्युम्नम् ) सब ओर से विज्ञान को तथा (अभिसहः) मुख्यतया शारीरिक और आत्मिक बल को (अभि-आ-यच्छस्व) सब ओर से विस्तार करो ।। ३ । ४० ।।
Essence
सब मनुष्य, परमेश्वर के अनुग्रह और अपने पुरुषार्थ से अग्निविद्या को प्राप्त करके नाना प्रकार के धन और बल का चहुँ ओर विस्तार करें ।। ३ । ४० ।।
Subject
फिर भौतिक अग्नि कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है।
Refrences
(रयिमान्) यहाँ प्रशंसा अर्थ में 'मतुप्' प्रत्यय है । 'रयि' शब्द निघं० (२ । १०) में धन-नामों में पढ़ा है। (आयच्छस्व) इस पद की सिद्धि पूर्व मन्त्र के समान है ।। ३ । ४० ।।
Commentary Essence
१. अग्नि (ईश्वर)--अग्नि अर्थात् ईश्वर पूर्ण विद्वान् है, यह सुख से भरपूर करने वाले गुणों से युक्त जनों में भी सब से श्रेष्ठ है, तथा सर्वोत्तम पदार्थों का प्रापक है। विज्ञान के साधक शारीरिक और आत्मिक बल का दाता है। किन्तु इसमें परमेश्वर का अनुग्रह आवश्यक है ।।

२. अग्नि (भौतिक)–यह भौतिक अग्नि तृप्त करने वाले कर्मों का साधक, प्रशस्त धनों का निवास स्थान तथा पुष्टि को बढ़ाने वाला है। ईश्वर के अनुग्रह और अपने पुरुषार्थ से इस अग्नि विद्या को जान कर नाना प्रकार के धन और बल को प्राप्त किया जा सकता है ।। ३ । ४० ।।