Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 32

63 Mantra
3/32
Devata- आदित्यो देवता Rishi- सप्तधृतिर्वारुणिर्ऋषिः Chhand- निचृत् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न॒हि तेषा॑म॒मा च॒न नाध्व॑सु वार॒णेषु॑। ईशे॑ रि॒पुर॒घश॑ꣳसः॥३२॥

न॒हि। तेषा॑म्। अ॒मा। च॒न। न। अध्व॒स्वित्यध्व॑ऽसु। वा॒र॒णेषु॑। ईशे॑। रि॒पुः। अ॒घश॑ꣳस॒ इत्य॒घऽश॑ꣳसः ॥३२॥

Mantra without Swara
नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु । ईशे रिपुरघशँसः ॥

नहि। तेषाम्। अमा। चन। न। अध्वस्वित्यध्वऽसु। वारणेषु। ईशे। रिपुः। अघशꣳस इत्यधऽशꣳसः॥३२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो (तेषाम्) परमेश्वर के उपासक हैं, उनके वा सूर्य के प्रकाश में रहने वालों के (अमा) घरों में (अध्वसु) मार्गों में (वारणेषु) युद्धों में एवं चोर, डाकू, व्याघ्र आदि के स्थान जङ्गलों में (चन) भी (अघशंस:) पाप कर्मों का प्रशंसक (रिपुः) शत्रु, उनको (नहि) क्लेश नहीं दे सकता, क्योंकि उस पापी का और उन ईश्वरोपासकों का मैं जगदीश्वर (ईशे) स्वामी हूँ ।। ३ । ३२ ।।
Essence
जो धर्मात्मा, सब का उपकार करने वाले मनुष्य हैं, उन्हें कहीं भी भय नहीं होता, जो अजातशत्रु मनुष्य हैं उनका कोई भी शत्रु नहीं होता ।। ३ । ३२ ।।
Subject
फिर वह जगदीश्वर कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
(अमा) 'अमा' शब्द निघं० (३ । ४) में गृह नामों में पढ़ा है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ । ३ । ४। ३७) में की गई है ।। ३ । ३२ ।।
Commentary Essence
ईश्वर कैसा है-- जो ईश्वर की उपासना करने वाले, धर्मात्मा, सर्वोपकारी मनुष्य हैं, उन्हें ईश्वर घर, मार्ग, युद्ध, जङ्गल सभी स्थानों में निर्भय कर देता है। और जो सूर्य के प्रकाश में रहते हैं वे भी निर्भय होते हैं। अपने उपासकों को ईश्वर अजातशत्रु बना देता है। उन्हें कोई भी शत्रु दुःख नहीं दे सकता, क्योंकि ईश्वर उनको समर्थ बना देता है ।। ३ । ३२ ।।