Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 30

63 Mantra
3/30
Devata- ब्रह्मणस्पतिर्देवता Rishi- सप्तधृतिर्वारुणिर्ऋषिः Chhand- निचृत् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मा नः॒ शꣳसो॒ऽअर॑रुषो धू॒र्तिः प्रण॒ङ् मर्त्य॑स्य। रक्षा॑ णो ब्रह्मणस्पते॥३०॥

मा। नः॒। शꣳसः॑। अर॑रुषः। धू॒र्तिः। प्रण॑क्। मर्त्य॑स्य। रक्ष॑। नः॒। ब्र॒ह्म॒णः॒। प॒ते॒ ॥३०॥

Mantra without Swara
मा नः शँसो अररुषो धूर्तिः प्र णङ्नर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते ॥

मा। नः। शꣳसः। अररुषः। धूर्तिः। प्रणक्। मर्त्यस्य। रक्ष। नः। ब्रह्मणः। पते॥३०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (ब्रह्मणस्पते) जगदीश्वर! आपकी कृपा से (नः) हमारी (शंसः) प्रशंसनीय कर्म (मा प्रणक्) कभी नष्ट न हों ।

जो (अररुषः) दूसरों के धन को लेने वाले (मर्त्यस्य) मनुष्य की (धूर्तिः) हिंसायुक्त धूर्तता है, उससे (नः) हमारी निरन्तर (रक्ष) रक्षा करो। ।। ३ । ३० ।।
Essence
मनुष्य सदा प्रशंसनीय कर्म करे, निन्दित नहीं ।

        किसी से द्रोह और दुष्टों का सङ्ग न करें।

      धर्म की रक्षा और ईश्वर की उपासना सदैव किया करें ।। ३ । ३० ।।
Subject
फिर उस परमेश्वर से किस लिए प्रार्थना करनी चाहिए, इस विषय का उपदेश किया जाता है ॥
Refrences
(प्रणक्) प्रणश्यतु । यहाँ लोट् अर्थ में लुङ् लकार है। 'मन्त्र घसह्वर ० ' [अ० २ । ४ । ८० ] सूत्र से 'च्लि' का लुक् है । (मर्त्यस्य) 'मर्त्य' शब्द निघं० (२ । ३) में मनुष्य नामों में पढ़ा है। (रक्षा) रक्ष। यहाँ 'द्व्यचोऽस्तिङ:' [अ० ६ । ३ । १३५] से दीर्घ है। (ब्रह्मणस्पते ) यहाँ 'षष्ठ्या: पतिपुत्र' (अ० ८। ३ । ५३) सूत्र से विसर्ग को सकार हो गया है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ । ३ । ४ ।३५) में की गई है ।। ३ । ३० ।।
Commentary Essence
ईश्वर प्रार्थना किस लिये-- ईश्वर-प्रार्थना करने से हमारे प्रशंसनीय कर्म नष्ट नहीं होते, जो अदानशील, दूसरों का धन अपहरण करने वाले दुष्ट जन हैं, ईश्वर उनके सङ्ग से हमारी रक्षा करता है। परद्रोह आदि दोषों से बचाता है। धर्म की रक्षा और ईश्वरोपासना के लिये प्रेरणा मिलती है ।। ३ । ३० ।।