Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 28

63 Mantra
3/28
Devata- बृहस्पतिर्देवता Rishi- प्रबन्धु ऋषिः Chhand- विराट् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सो॒मान॒ꣳ स्वर॑णं कृणु॒हि ब्र॑ह्मणस्पते। क॒क्षीव॑न्तं॒ यऽऔ॑शि॒जः॥२८॥

सो॒मान॑म्। स्व॑रणम्। कृ॒णु॒हि॒। ब्र॒ह्म॒णः॒। प॒ते॒। क॒क्षीव॑न्तम्। यः। औ॒शि॒जः ॥२८॥

Mantra without Swara
सोमानँ स्वरणङ्कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तँ यऽऔशिजः ॥

सोमानम्। स्वरणम्। कृणुहि। ब्रह्मणः। पते। कक्षीवन्तम्। यः। औशिजः॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
(ब्रह्मणस्पते) सनातन वेद शास्त्र के पालक ईश्वर ! (यः) जो मैं विद्वान् (औशिज:) सब विद्याओं का अभिलाषी विद्यापुत्र हूँ उसे आप (कक्षीवन्तम् ) विद्या ग्रहण का इच्छुक होकर विद्या अध्ययन में उत्तम नीति वाला (स्वरणम्) सब विद्याओं का प्रवचन करने वाला (सोमानम्) औषधि सारों का निष्पादन करने वाला एवं विद्यासिद्धि करने वाला मुझे (कृणुहि ) बना ॥३।२८ ।।
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमा अलङ्कार है ॥ पुत्र दो प्रकार के हैं--एक औरस (शरीर से उत्पन्न) और दूसरा विद्याज (विद्या से उत्पन्न) । इन दो प्रकार के पुत्रों की प्राप्ति के लिये सब मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करें, जिससे हम लोग विद्या से प्रकाशित, सब क्रियाओं में कुशल, प्रीतिपूर्वक विद्या को पढ़ाने वाले पुत्रों से युक्त हों ।। ३ । २८ ।।
Subject
फिर उस जगदीश्वर से किस लिए प्रार्थना करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
(कक्षीवन्तम्) यहाँ आधिक्य अर्थ में 'मतुप्' प्रत्यय है। 'कक्ष्यायाः संज्ञायां मतौ सम्प्रसारणं कर्त्तव्यम् (अ० ६ । १ । ३७) वार्तिक से सम्प्रसारण आदेश है। 'आसन्दीवदष्ठीवच्च०' (अ॰ ८ । २ । १२) सूत्र से निपातन से मकार के स्थान में वकार आदेश है। 'सोमानम्॰' इत्यादि मन्त्र की व्याख्या यास्कमुनि ने निरु० (६ । १०) में इस प्रकार की है--सोमानम्=सोतारम्=औषधि के रसों का सेवन करने वाला, स्वरणम् =प्रकाशनवन्तम्=विद्या से प्रकाशित कृणुहि=कुरु करो । ब्रह्मणस्पते!=वेद-शास्त्र के पालक ईश्वर, कक्षीवन्तम्=कक्षीवान्=कक्ष्यावान्, कक्ष्या=विद्याध्ययनकर्म में उत्तम नीति वाला एवं विद्या का जिज्ञासु । औशिजः=उशिक का पुत्र । 'उशिक' पद कान्ति अर्थ वाली 'वश्' धातु से बनता है अर्थात् सब विद्याओं का इच्छुक विद्वान् का पुत्र । (कक्षीवन्तम् ) इसका अभिप्राय मनुष्य की कक्ष्या (कोटि) इस प्रकार ब्रह्मणस्पते ! मुझे सोमानम्=ओषधिसारों और विद्याओं का सेवन करने वाला स्वरणम्=सब विद्याओं का प्रकाशन करने वाला। इस मन्त्र की व्याख्या शत. (२ । ३ । ४ । ३५) में की गई है ॥ ३ ॥ २८ ॥
Commentary Essence
ईश्वर-प्रार्थना किस लिये-- ईश्वर सनातन वेदशास्त्र का पति है, जो प्रार्थना करने से औरस तथा विद्याज पुत्र प्रदान करता है, जो विद्या अध्ययन कर्म में कुशल, विद्या ग्रहण के इच्छुक, सब विद्याओं के प्रवक्ता, औषधिसारों एवं विद्याओं के साधक, सब क्रियाओं में कुशल और विद्या से प्रकाशित होते हैं ॥ ३ ॥ २८ ॥