Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 23

63 Mantra
3/23
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वैश्वामित्रो मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- विराट् गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्द्ध॑मान॒ꣳ स्वे दमे॑॥२३॥

राज॑न्तम्। अ॒ध्व॒राणा॑म्। गो॒पाम्। ऋ॒तस्य॑। दीदि॑विम्। वर्ध॑मानम्। स्वे। दमे॑ ॥२३॥

Mantra without Swara
राजन्तमध्वराणाङ्गोपामृतस्य दीदिविम् । वर्धमानँ स्वे दमे ॥

राजन्तम्। अध्वराणाम्। गोपाम्। ऋतस्य। दीदिविम्। वर्धमानम्। स्वे। दमे॥२३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
 (नमः) अन्न को (भरन्तः) धारण करते हुए हम लोग (धिया) कर्म वा बुद्धि से (अध्वराणाम्) अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त यज्ञों के (गोपाम्) इन्द्रिय और पशु आदि के रक्षक' (राजन्तम्) प्रकाशमान (ऋतस्य ) अनादिस्वरूप सत्यकारण (प्रकृति) को (दीदिविम्) व्यवहार के योग्य बनाने वाले [जगदीश्वर को] (स्वे) अपने (दमे) शान्तिदायक स्थान एवं अत्यन्त उत्कृष्ट प्राप्त करने के योग्य पद पर (वर्धमानम्) बढ़ते हुए हानिरहित जगदीश्वर को [हम लोग] ( उपैमसि) सदा प्राप्त करें। यह मन्त्र का पहला अर्थ है।

   जिस परमात्मा ने (अध्वाराणाम्) शिल्पविद्या से साध्य, सब प्रकार रक्षा करने योग्य यज्ञों के (गोपाम् ) इन्द्रिय तथा पशु आदि के रक्षक (राजन्तम् ) प्रकाशमान (ऋतस्य) जल को (दीदिविम्) व्यवहार योग्य बनाने वाली (स्वे) अपने (दमे) शान्त रूप में (वर्धमानः) बढ़ती हुई जो अग्नि प्रकाशित की है, उस (नमः) अन्न को (भरन्तं) धारण करते हुये हम लोग (धिया) कर्म वा बुद्धि से (उप-ए-मसि) सदा प्राप्त करें । यह मन्त्र का दूसरा अर्थ है ।। ३ । २३ ।।
Essence
मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है ।। यहाँ नमः, भरन्तः, धिया, उप, आ और इमसि इन छः पदों की पूर्व मन्त्र से अनुवृत्ति समझें ।

 परमेश्वर अनादिस्वरूप कारण (प्रकृति) से सब कार्य पदार्थों की रचना करता है, और भौतिक अग्नि जल को प्राप्त करा कर सब व्यवहारों को साधता है, ऐसा समझें ।। ३ । २३ ।।
Subject
फिर ईश्वर और अग्नि के गुणों का उपदेश किया जाता है ।।
Refrences
(ऋतम्) 'ऋत' शब्द निघं० ( ३ । १० ) में सत्य नामों में पढ़ा है और निघं॰ ( १ । १२ ) में जल-नामों में पढ़ा है। (दीदिविम्) 'दीदिवि' शब्द 'दिवो द्वे दीर्घश्चाभ्यासस्य' उ० (४ । ५५) सूत्र से 'दिव्' धातु से 'क्विन्' प्रत्यय, द्वित्व और अभ्यास को दीर्घ करने से सिद्ध होता है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० ( २ । ३ । २ । २९ ) में की गई है ।। ३ । २३ ।।
Commentary Essence
१. अग्नि (ईश्वर) के गुण--अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त यज्ञों के अङ्ग तथा सब प्राणियों का रक्षक, प्रकाशस्वरूप, अनादि कारण (प्रकृति) से व्यवहार के योग्य सब कार्य जगत् का रचक, जहाँ सब लोग शान्ति को प्राप्त करते हैं, परम उत्कृष्ट एवं प्राप्त करने के योग्य है, हानिरहित है।

२. अग्नि (भौतिक) के गुण--शिल्पविद्या से साध्य एवं सर्वथा रक्षा करने योग्य यज्ञों के अङ्गों तथा सब प्राणियों का रक्षक है, प्रकाशमान, जल की प्राप्ति से सब व्यवहारों का साधक, शान्तस्वरूप इस संसार रूप घर में वृद्धि को प्राप्त होने वाला है ।

३. अग्नि (ईश्वर / भौतिक) की प्राप्ति--अन्न आदि उत्तम पदार्थों का सेवन करते हुये ज्ञान और कर्म से ईश्वर और अग्नि विद्या को प्राप्त करें ।।

४. अलंकार—यहाँ श्लेष अलङ्कार होने से अग्नि शब्द से ईश्वर और भौतिक अग्नि अर्थों का ग्रहण किया जाता है ॥ ३ । २३ ।।