Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 20

63 Mantra
3/20
Devata- आपो देवता Rishi- याज्ञवल्क्यः Chhand- भूरिक् बृहती, Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अन्ध॒ स्थान्धो॑ वो भक्षीय॒ मह॑ स्थ॒ महो॑ वो भक्षी॒योर्ज॒ स्थोर्जं॑ वो भक्षीय रा॒यस्पोष॑ स्थ रा॒यस्पोषं॑ वो भक्षीय॥२०॥

अन्धः॑। स्थ॒। अन्धः॑। वः॒। भ॒क्षी॒य॒। महः॑। स्थ॒। महः॑। वः॒। भ॒क्षी॒य॒। ऊ॒र्जः॑। स्थ॒। ऊर्ज्ज॑म्। वः॒। भ॒क्षी॒य॒। रा॒यः। पोषः॑। स्थ॒। रा॒यः। पोष॑म्। वः॒। भ॒क्षी॒य॒ ॥२०॥

Mantra without Swara
अन्ध स्थान्धो वो भक्षीय मह स्थ महो वो भक्षीयोर्ज स्थोर्जँवो भक्षीय रायस्पोष स्थ रायस्पोषँवो भक्षीय ॥

अन्धः। स्थ। अन्धः। वः। भक्षीय। महः। स्थ। महः। वः। भक्षीय। ऊर्जः। स्थ। ऊर्ज्जम्। वः। भक्षीय। रायः। पोषः। स्थ। रायः। पोषम्। वः। भक्षीय॥२०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो (अन्धः) अन्न एवं बल को बढ़ाने वाले वृक्ष औषधि आदि पदार्थ (स्थ) हैं उनसे मैं (अन्धः) बल वीर्य बढ़ाने वाले अन्न एवं प्राप्त करने योग्य रस को (भक्षीय) ग्रहण करूँ अर्थात् सेवन करूँ ।

  जो (महः) महान् वायु अग्नि आदि वा विद्या आदि पदार्थ (स्थ) हैं (व:) उन महान् पदार्थों से (महः) महान् सिद्धियों को एवं महान् गुणों को मैं (भक्षीय) स्वीकार करूँ ।

  जो (ऊर्ज:) बल पराक्रम बढ़ाने वाले रसीले जल, दुग्ध, घी, मधु, फल आदि पदार्थ (स्थ) हैं (वः) उन बलदायक पदार्थों से (ऊर्जम्) रस एवं बल पराक्रम को मैं (भक्षीय) भोग एवं सेवन करूँ ।

 जो (रायस्पोषः) बहुत गुणों वाले पदार्थों के उपभोग से प्राप्त होने वाली पुष्टियाँ (स्थ) हैं (वः) उन चक्रवर्ती राज्यश्री आदि से मैं (रायस्पोषम्) बहुत शुभ गुणों से युक्त पुष्टि तथा उत्तम धनों के भोग को (भक्षीय) सेवन करूँ ।। ३ । २० ।।
Essence
मनुष्य जगत् के पदार्थों के गुणों को जानकर क्रियाकौशल से उपकार ग्रहण करके सब सुखों को भोगें ॥ ३ । २० ।।
Subject
अब यज्ञ से शुद्ध किये औषधि आदि पदार्थों का उपदेश किया जाता है।
Refrences
(अन्ध:) 'अन्ध:' शब्द निघं० (२ । ७) में अन्न नामों में पढ़ा है। 'अदेर्नुम् धौ च' (उ० ४ । २०६) सूत्र से 'असुन्' प्रत्यय, 'नुम्' का आगम और धकार आदेश है। (अन्धस्थ ) यहाँ 'वा शर्प्रकरणे खर्परे लोपो वक्तव्यः' (अ० ८।३।३६) वार्त्तिक से विसर्ग का लोप है। (स्थ) सन्ति । यहाँसर्वत्र व्यत्यय: है। (अन्ध:) 'अन्ध' शब्द निघं० (४ । २) में पद-नामों में पढ़ा है। इससे प्राप्तव्य रस गृहीत होता है। (रायस्पोष:) 'रायस्पोष' शब्द का अर्थ शत० (३ । १ । १ । १२) में 'भूमा' [ बहुत गुणों से पुष्टि ] है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ । ३ । ४ । २५) में की गई है ।। ३ । २० ।।
Commentary Essence
यज्ञ से शुद्ध किये औषधि आदि पदार्थों का सेवन--सब मनुष्य यज्ञ से शुद्ध किये हुये, बलकारक वृक्षों के फल, औषधियाँ एवं अन्नों का सेवन करें, और जो यज्ञ से शुद्ध हुये महान् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं तथा नाना विद्यायें हैं, उनसे महान् क्रियाओं को सिद्ध करें तथा महान् गुणों को प्राप्त करें, और जो रसीले जल, दूध, घी, मधु, फल आदि पदार्थ हैं, उनसे बल-पराक्रम को प्राप्त करें, इसी प्रकार और भी जो बहुत गुणों से युक्त पुष्टिकारक पदार्थ हैं, उनके सेवन से पूर्ण पुष्टि को प्राप्त करें। किन्तु यह सब पदार्थों के गुण ज्ञान एवं क्रियाकौशल से ही सम्भव है ।