Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 2

63 Mantra
3/2
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सुश्रुत ऋषिः Chhand- गायत्री, Swara- षड्जः
Mantra with Swara
सुस॑मिद्धाय शो॒चिषे॑ घृ॒तं ती॒व्रं जु॑होतन। अ॒ग्नये॑ जा॒तवे॑दसे॥२॥

सुस॑मिद्धा॒येति सुऽस॑मिद्धाय। शो॒चिषे॑। घृ॒तम्। ती॒व्रम्। जु॒हो॒त॒न॒। अ॒ग्नये॑। जा॒तवे॑दस॒ इति॑ जा॒तऽवे॑दसे ॥२॥

Mantra without Swara
सुसमिद्धाय शोचिषे घृतन्तीव्रं जुहोतन । अग्नये जातवेदसे ॥

सुसमिद्धायेति सुऽसमिद्धाय। शोचिषे। घृतम्। तीव्रम्। जुहोतन। अग्नये। जातवेदस इति जातऽवेदसे॥२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (सुसमिद्धाय ) अच्छे प्रकार प्रदीप्त (शोचिषे) शुद्ध, दोषों का निवारण करने वाले (जातवेदसे) उत्पन्नमात्र पदार्थ में विद्यमान (अग्नये ) रूप, दाह, प्रकाश, छेदन आदि गुण स्वभाव वाले अग्नि में (तीव्रम्) सब दोषों के निवारण करने में तीक्ष्ण स्वभाव वाले (घृतम्) घृत आदि का (जुहोतन) होम करो।
Essence
सब मनुष्य इस प्रदीप्त अग्नि में शीघ्र दोषों का निवारण करने वाले शुद्ध किए हुये द्रव्यों का होम करके सब सुखों को सिद्ध करें ।। ३।२ ॥

अन्यत्र व्याख्यात--महर्षि ने इस मन्त्र का विनियोग संस्कारविधि (सामान्य प्रकरण) में समिधा की दूसरी आहुति देने में किया है।
Subject
फिर वह भौतिक अग्नि कैसा है और उसका किस प्रकार उपयोग चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है।
Refrences
(सुसमिद्धाय) यहाँ 'सुपां सुलुक्' (प्र० ७ ।१ ।३६) सूत्र से सप्तमी के स्थान में चतुर्थी विभक्ति है। (जातवेदसे) निरु० (७ । १९) के अनुसार 'जातवेदस्' शब्द का अर्थ इस प्रकार है—“यह प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान रहता है। इससे धन उत्पन्न होता है, यह स्वभाव से ज्ञानवान होता है अथवा स्वभाव से प्रकाश से प्रकाशशील है। क्योंकि उत्पन्न होते ही इसने देखने वाले मनुष्य आदि प्राणियों को प्राप्त किया। इसलिए इस जातवेदः का जातवेदस्त्व है" । ३ । २ ।।
Commentary Essence
१. अग्नि (भौतिक) कैसा है--अच्छी प्रकार प्रदीप्त होने वाला, शुद्ध होने पर शीघ्र दोषों का निवारण करने वाला, प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान, रूप, दाह, प्रकाश, छेदन आदि गुणस्वभाव वाला है।

२. अग्नि का उपयोग--मनुष्य उक्त गुण वाले अग्नि में शीघ्र दोषों का निवारण करने वाले, शुद्ध किये हुये घृत आदि द्रव्यों को होम करके सुखों को सिद्ध करें ॥ ३ ॥ २ ॥