Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 3 / Mantra 15

63 Mantra
3/15
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- भूरिक् त्रिष्टुप्, Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒यमि॒ह प्र॑थ॒मो धा॑यि धा॒तृभि॒र्होता॒ यजि॑ष्ठोऽअध्व॒रेष्वीड्यः॑। यमप्न॑वानो॒ भृग॑वो विरुरु॒चुर्वने॑षु चि॒त्रं वि॒भ्वं वि॒शेवि॑शे॥१५॥

अ॒यम्। इ॒ह। प्र॒थ॒मः। धा॒यि॒। धा॒तृभि॒रिति॑ धा॒तृऽभिः॑। होता॑। यजि॑ष्ठः। अ॒ध्व॒रेषु॑। ईड्यः॑। यम्। अप्न॑वानः। भृग॑वः। वि॒रु॒रु॒चुरिति॑ विऽरुरु॒चुः। वने॑षु। चि॒त्रम्। विभ्व᳕मिति॑ वि॒ऽभ्व॒म्। वि॒शेवि॑श॒ इति॑ वि॒शेऽवि॑शे ॥१५॥

Mantra without Swara
अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्हाता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः । यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रँविभ्वँविशेविशे ॥

अयम्। इह। प्रथमः। धायि। धातृभिरिति धातृऽभिः। होता। यजिष्ठः। अध्वरेषु। ईड्यः। यम्। अप्नवानः। भृगवः। विरुरुचुरिति विऽरुरुचुः। वनेषु। चित्रम्। विभ्वमिति विऽभ्वम्। विशेविश इति विशेऽविशे॥१५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
 (अप्नवानः) जो विद्या सन्तान बनाने वाले (भृगवः) यज्ञ विद्या के वेत्ता विद्वान हैं, वे (इह) इस संसार में (वनेषु) सेवन करने योग्य (अध्वरेषु) उपासना तथा अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त अथवा शिल्प विद्या-अन्तर्गत यज्ञों में (विशे विशे) प्रत्येक प्रजा में (विभ्वम्) व्यापक (चित्रम्) अद्भुत गुण वाली जिस अग्नि को (विरुरुचुः) प्रदीप्त करते हैं, वह (अयम्) यह ईश्वर वा (भौतिक) अग्नि (धातृभिः) यज्ञ को धारण करने वाले विद्वानों से (प्रथमः) यज्ञ में उपासना के योग्य है वा यज्ञ में पहला साधन है और (ईड्यः) उपासना वा पूजा के योग्य है (होता) ग्रहण करने वाला तथा (यजिष्ठः) अत्यन्त आनन्द एवं शिल्पविद्या की संगति का निमित्त है, वह अग्नि (इह) इस संसार में (धायि) उक्त विद्वानों के द्वारा धारण किया जाता है । ३ । १५ ।।
Essence
इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है । विद्वान् लोग यज्ञक्रिया की सिद्धि के लिये उपासना के योग्य अथवा साधन रूप इस अग्नि (ईश्वर) की स्तुति अथवा भौतिक अग्नि को ग्रहण करके इस सृष्टि में प्रजा के सब सुखों को सिद्ध करें ।। । १५ ।।
Subject
फिर वह अग्नि कैसा है, इस विषय का उपदेश किया जाता है।
Refrences
(धायि) ध्रियते। यहाँ वर्तमान (लट्) अर्थ में लुङ् लकार है। 'बहुलं छन्दस्यमाङ्योगेऽपि [अ० ६ । ४ । ७५] सूत्र से 'अट्' आगम का अभाव है (अप्नवानः ) यह शब्द 'तत्करोति तदाचष्टे' (अ० ३ ।१ ।२६) वार्तिक से करोति ( करने ) अर्थ में 'णिच्’ प्रत्यय करने पर 'अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते’ [अ० ३ ।२ ।३५] सूत्र से 'वनिप्' प्रत्यय करने पर सिद्ध होता है। 'अप्नः' शब्द निघं० (२ ।२) में अपत्य-नामों में पढ़ा है। (भृगवः) यह बहुवचनान्त 'भृगव:' शब्द निघं ० ( ५ ।५ ) में पद-नामों में पढ़ा है। इससे ज्ञानवत्ता गृहीत होती है। (विरुरुचुः) विदीपयन्ति । यहाँलट् अर्थ में लिट् लकार है। (विभ्वम्) यहाँ'वा छन्दसि' [६ ।१ ।१०६] सूत्र से पूर्वरूप आदेश नहीं है। इस मन्त्र की व्याख्या शत० (२ ।३ ।२।१४) में की गई है ।। ३ । १५ ।।
Commentary Essence
 १. अग्नि (ईश्वर)--जो सम्पूर्ण प्रजा में व्याप्त, अद्भुत गुणों वाला ईश्वर है, उसे विद्वान् लोग सन्ध्योपासना सिन तथा अग्निहोत्र से ले के अश्वमेध पर्यन्त यज्ञों में प्रकाशित करते हैं । यज्ञ क्रिया को जानने वाले विद्वान् यज्ञ क्रिया की सिद्धि के लिये उसे उपास्य समझते हैं, उसकी स्तुति करते हैं, ईश्वर विद्वानों की उपासना और स्तुति को ग्रहण करने वाला तथा अत्यन्त आनन्द का प्रापक है ।।

२. अग्नि (भौतिक) – यह भौतिक अग्नि सब प्रजा में व्याप्त है, अद्भुत गुणों वाला है, यज्ञ विद्या के जानने वाले विद्वान् लोग अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त यज्ञों एवं शिल्प विद्या के अन्तर्गत यज्ञों में इसे प्रदीप्त करते हैं, उक्त विद्वान लोग इसे यज्ञ क्रिया की सिद्धि में पहला साधन, पूजा के योग्य, हव्य पदार्थों को ग्रहण करने वाला, शिल्प विद्या का प्रापक समझ कर धारण करते हैं ।

३. विद्वान्--जो विद्वान् विद्या-सन्तान करते हैं वे 'अप्नवा' कहलाते हैं तथा जो यज्ञविद्या के जानने वाले हैं वे 'भृगु' कहाते हैं ।

४. अलङ्कार--यहाँश्लेष-अलङ्कार होने से अग्नि शब्द का अर्थ ईश्वर और भौतिक अग्नि है ॥