Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 7

48 Mantra
25/7
Devata- पूषादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- निचृदष्टिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
पू॒षणं॑ वनि॒ष्ठुना॑न्धा॒हीन्त्स्स्थू॑लगु॒दया॑ स॒र्पान् गुदा॑भिर्वि॒ह्रुत॑ऽआ॒न्त्रैर॒पो व॒स्तिना॒ वृष॑णमा॒ण्डाभ्यां॒ वाजि॑न॒ꣳ शेपे॑न प्र॒जा रेत॑सा॒ चाषा॑न् पि॒त्तेन॑ प्रद॒रान् पा॒युना॑ कू॒श्माञ्छ॑कपि॒ण्डैः॥७॥

पू॒षण॑म्। व॒नि॒ष्ठुना॑। अ॒न्धा॒हीनित्य॑न्धऽअ॒हीन्। स्थू॒ल॒गु॒दयेति॑ स्थूलऽगु॒दया॑। स॒र्पान्। गुदा॑भिः। वि॒ह्रुत॒ इति॑ वि॒ऽह्नुतः॑। आ॒न्त्रैः। अ॒पः। व॒स्तिना॑। वृष॑णम्। आ॒ण्डाभ्या॑म्। वाजि॑नम्। शेपे॑न। प्र॒जामिति॑ प्र॒ऽजाम्। रेत॑सा। चाषा॑न्। पि॒त्तेन॑। प्र॒द॒रानिति॑ प्रऽद॒रान्। पा॒युना॑। कू॒श्मान्। श॒क॒पि॒ण्डैरिति॑ शकऽपि॒ण्डैः ॥७ ॥

Mantra without Swara
पूषणँवनिष्ठुनान्धाहीन्त्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विह््रुतऽआन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्याँवाजिनँ शेपेन प्रजाँ रेतसा चाषान्पित्तेन प्रदरान्पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः ॥

पूषणम्। वनिष्ठुना। अन्धाहीनित्यन्धऽअहीन्। स्थूलगुदयेति स्थूलऽगुदया। सर्पान्। गुदाभिः। विह्रुत इति विऽह्नुतः। आन्त्रैः। अपः। वस्तिना। वृषणम्। आण्डाभ्याम्। वाजिनम्। शेपेन। प्रजामिति प्रऽजाम्। रेतसा। चाषान्। पित्तेन। प्रदरानिति प्रऽदरान्। पायुना। कूश्मान्। शकपिण्डैरिति शकऽपिण्डैः॥७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम--(वनिष्ठुना) माँगने से (पूषणम्) पुष्टि करने वाले को, (स्थूल=गुदया) स्थूल गुदा से युक्त (अन्धाहीन्) अन्धे साँपों को, (गुदाभिः) गुदा सहित (विह्रुतः) विशेष कुटिल साँपों को, (आन्त्रैः) उदर की नाड़ी विशेषों से (अप:) जलों को, (बस्तिना) बस्ती=मूत्राशय से (वृषणम्) लिंग को, (आण्डाभ्याम्) अण्डाकार लिंग के अवयवों से (वाजिनम्) घोड़े को, (शेपेन) लिंग एवं (रेतसा) वीर्य से (प्रजाम्) सन्तान को, (पित्तेन) पित्त से (चाषान्) भोजनों को (प्रदरान्) उदर के अवयवों की (पायुना) पायु=गुदा इन्द्रिय से, (शकपिण्डै:) शक्ति के पिण्डों से (कूश्मान्) शासनों को ग्रहण करो ॥ २५ । ७ ॥
Essence
जिस-जिस अंग वा पदार्थ से जो-जो कार्य सिद्ध हो उस-उस अंग वा पदार्थ से उस-उस को सिद्ध करें ॥ २५ । ७ ॥
Subject
किसके लिए कौन होता है, इसका फिर उपदेश किया है ॥
Refrences
(कूश्मान्) यहाँ 'कश' धातु से 'मक्' प्रत्यय और 'अन्येषामपि दृश्यते' (६। ३। १३७) से दीर्घ है ॥
Commentary Essence
किससे क्या सिद्ध करें--याचना से पुष्टिकर पदार्थ को, स्थूल गुदा से अन्धे सर्पों को, गुदा से विशेष कुटिल सर्पों को (अर्थात् सांप को अग्र भाग से वश में नहीं किया जा सकता, गुदा से अभिप्राय पूंछ भाग से है), आंतों (उदर की नाडी विशेष) से जलों को, बस्ती=नाभि के अधोभाग से लिंग को, अण्डकोषों से घोड़े को, लिंग एवं वीर्य से प्रजा=सन्तान को, पित्त से भोजन को, पायु=गुदेन्द्रिय से उदर के अवयवों को, शक्ति से शासन को सिद्ध करें । तात्पर्य यह है कि जिस जिस अंग वा पदार्थ से जो-जो कार्य सिद्ध होता है उसे सिद्ध करें ॥ २५ । ७ ॥