Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 5

48 Mantra
25/5
Devata- इन्द्रादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- स्वराड् विकृतिः Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ॒न्द्रा॒ग्न्योः प॑क्ष॒तिः सर॑स्वत्यै॒ निप॑क्षतिर्मि॒त्रस्य॑ तृ॒तीया॒ऽपां च॑तु॒र्थी निर्ऋ॑त्यै पञ्च॒म्यग्नीषोम॑योः ष॒ष्ठी स॒र्पाणा॑ सप्त॒मी विष्णो॑रष्ट॒मी पू॒ष्णो न॑व॒मी त्वष्टु॑र्दश॒मीन्द्र॑स्यैकाद॒शी वरु॑णस्य द्वाद॒शी य॒म्यै त्र॑योद॒शी द्यावा॑पृथि॒व्योर्दक्षि॑णं पा॒र्श्वं विश्वे॑षां दे॒वाना॒मुत्त॑रम्॥५॥

इ॒न्द्रा॒ग्न्योः। प॒क्ष॒तिः। सर॑स्वत्यै। निप॑क्षति॒रि॒ति॒ निऽप॑क्षतिः। मि॒त्रस्य॑। तृ॒तीया॑। अ॒पाम्। च॒तु॒र्थी। निर्ऋ॑त्या॒ऽइति॒ निःऽऋ॑त्यै। प॒ञ्च॒मी। अ॒ग्नीषोम॑योः। ष॒ष्ठी। स॒र्पाणा॑म्। स॒प्त॒मी। विष्णोः॑। अ॒ष्ट॒मी। पू॒ष्णः। न॒व॒मी। त्वष्टुः॑। द॒श॒मी। इन्द्र॑स्य। ए॒का॒द॒शी। वरु॑णस्य। द्वा॒द॒शी। य॒म्यै। त्र॒यो॒द॒शीति॑ त्रयःऽद॒शी। द्यावा॑पृथि॒व्योः। दक्षि॑णम्। पा॒र्श्वम्। विश्वे॑षाम्। दे॒वाना॑म्। उत्त॑रम् ॥५ ॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्न्योः पक्षति सरस्वत्यै निपक्षतिर्मित्रस्य तृतीयापाञ्चतुर्थी निरृत्यै पञ्चम्यग्नीषोमयोः षष्ठी सर्पाणाँ सप्तमी विष्णोरष्टमी पूष्णो नवमी त्वष्टुर्दशमीन्द्रस्यैकादशी वरुणस्य द्वादशी यम्यै त्रयोदशी द्यावापृथव्योर्दक्षणम्पार्श्वं विश्वेषान्देवानामुत्तरम् ॥

इन्द्राग्न्योः। पक्षतिः। सरस्वत्यै। निपक्षतिरिति निऽपक्षतिः। मित्रस्य। तृतीया। अपाम्। चतुर्थी। निर्ऋत्याऽइति निःऽऋत्यै। पञ्चमी। अग्नीषोमयोः। षष्ठी। सर्पाणाम्। सप्तमी। विष्णोः। अष्टमी। पूष्णः। नवमी। त्वष्टुः। दशमी। इन्द्रस्य। एकादशी। वरुणस्य। द्वादशी। यम्यै। त्रयोदशीति त्रयःऽदशी। द्यावापृथिव्योः। दक्षिणम्। पार्श्वम्। विश्वेषाम्। देवानाम्। उत्तरम्॥५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम--(इन्द्राग्न्योः) वायु और अग्नि के (पक्षतिः) पक्ष=स्वीकार करने के मूल, (सरस्वत्यै) सरस्वती=वाणी के (निपक्षतिः) निश्चित पक्ष=स्वीकार करने के मूल, (मित्रस्य) मित्र की (तृतीया) तीसरी, (अपाम्) जलों की (चतुर्थी) चौथी, (निर्ऋत्यै) भूमि की (पञ्चमी) पाँचवीं, (अग्नीषोमयोः) शीत और उष्णकारक जल और अग्नि की (षष्ठी) छठी, (सर्पाणाम्) साँपों की (सप्तमी) सातवीं, (विष्णोः) विष्णु की (अष्टमी) आठवीं, (पूष्ण:) पोषक की (नवमी) नौवीं, (त्वष्टु:) प्रदीप्त सूर्य की (दशमी) दसवीं, (इन्द्रस्य) जीव की (एकादशी) ग्यारहवीं, (वरुणस्य) श्रेष्ठ जन की (द्वादशी) बारहवीं और (यम्यै) यम=न्यायकर्त्ता स्त्री की (त्रयोदशी) तेरहवीं क्रिया को जानो। (द्यावापृथिव्योः) प्रकाश और भूमि के (दक्षिणम्) दाहिने (पार्श्वम्) भाग को और (विश्वेषाम्) सब (देवानाम्) विद्वानों के (उत्तरम्) उत्तर भाग को जानो ॥ २५ । ५ ॥
Essence
सब मनुष्य इन मन्त्रोक्त वायु आदि के गुणों के विज्ञान के लिए विविध क्रियाएँ करके कार्यों को सिद्ध करें ॥ २५ । ५ ॥
Subject
फिर किसके लिए कौन क्रिया होती है, इस विषय का उपदेश किया है॥
Commentary Essence
किस के लिए कौन क्रिया होती है--सबमनुष्य--वायु और अग्नि के लिए पक्षति नामक क्रिया, सरस्वती के लिए निपक्षति नामक क्रिया, मित्र के लिए तीसरी क्रिया, जलों के लिए चौथी क्रिया, भूमि के लिए पाँचवीं क्रिया, शीत और उष्ण करने वाले जल और अग्नि के लिए छठी क्रिया, साँपों के लिए सातवीं क्रिया, विष्णु की आठवीं क्रिया, पूषा की नौवीं क्रिया, त्वष्टा की दसवींक्रिया, इन्द्र=जीव की ग्यारहवीं क्रिया, वरुण (श्रेष्ठ पुरुष) की बारहवीं क्रिया, यमी= न्यायकर्त्री विदुषी की तेरहवीं क्रिया होती है। मनुष्य अग्नि आदि के विज्ञान के लिए उक्त विविध क्रियाएँ करके कार्यों को सिद्ध करें । प्रकाश और भूमि के दक्षिण पार्श्व और विद्वानों के उत्तर पार्श्व को समझें ॥ २५ । ५ ॥