Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 39

48 Mantra
25/39
Devata- विद्वांसो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यदश्वा॑य॒ वास॑ऽउपस्तृ॒णन्त्य॑धीवा॒सं या हिर॑ण्यान्यस्मै।स॒न्दान॒मर्व॑न्तं॒ पड्वी॑शं प्रि॒या दे॒वेष्वा या॑मयन्ति॥३९॥

यत्। अश्वा॑य। वासः॑। उ॒प॒स्तृ॒णन्तीत्यु॑पऽस्तृ॒णन्ति॑। अ॒धी॒वा॒सम्। अ॒धि॒वा॒समित्य॑धिऽवा॒सम्। या। हिर॑ण्यानि। अ॒स्मै॒। स॒न्दान॒मिति॑ स॒म्ऽदान॑म्। अर्व॑न्तम्। पड्वी॑शम्। प्रि॒या। दे॒वेषु॑। आ। या॒म॒य॒न्ति॒। य॒म॒य॒न्तीति॑ यमयन्ति ॥३९ ॥

Mantra without Swara
यदश्वाय वासऽउपस्तृणन्त्यधीवासँया हिरण्यान्यस्मै । सन्दानमर्वन्तम्पड्वीशम्प्रिया देवेष्वा यामयन्ति ॥

यत्। अश्वाय। वासः। उपस्तृणन्तीत्युपऽस्तृणन्ति। अधीवासम्। अधिवासमित्यधिऽवासम्। या। हिरण्यानि। अस्मै। सन्दानमिति सम्ऽदानम्। अर्वन्तम्। पड्वीशम्। प्रिया। देवेषु। आ। यामयन्ति। यमयन्तीति यमयन्ति॥३९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! आप--(अस्मै) इस (अश्वाय) घोड़े के लिए (यत्) जो (वासः) वस्त्र, (अधीवासम्) ऊपर का वस्त्र, (सन्दानम्) शिरोबन्धन आदि है, तथा उसे (या) जिन (हिरण्यानि) सुवर्ण के आभूषणों से (उपस्तृणन्ति) आच्छादित करते हैं; जिस (पड्वीशम्) पाँव से प्रविष्ट होने वाले (अर्वन्तम् ) गतिशील घोड़े को (आ+यामयन्ति) सब ओर से नियन्त्रित करते हैं; वे सब कार्य (देवेषु) विद्वानों में (प्रिया) प्रिय हों ॥ २५ । ३९॥
Essence
यदि मनुष्य घोड़े आदि पशुओं की यथावत् रक्षा करके उपकार ग्रहण करें तो बहुत कार्यों की सिद्धि से उपकारयुक्त हों ॥ २५।३९॥
Subject
अश्व आदि पशुओं की रक्षा का फिर उपदेश किया है॥
Commentary Essence
अश्व आदि की रक्षा--सब मनुष्य घोड़े आदि पशुओं को वस्त्र, ऊपर का वस्त्र, शिरोबन्धन और सुवर्ण आदि से बने आभूषणों से आच्छादित करें। अर्थात् उनकी यथावत् रक्षा करें। उन्हें सब ओर से नियन्त्रित करें। ये सब कार्य विद्वानों में प्रिय हों। घोड़े आदि पशुओं से उपकार ग्रहण करें तथा नाना कार्यों को सिद्ध करें ॥ २५ । ३९॥