Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 28

48 Mantra
25/28
Devata- यज्ञो देवता Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- निचृत् त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
होता॑ध्व॒र्युराव॑याऽअग्निमि॒न्धो ग्रा॑वग्रा॒भऽउ॒त शस्ता॒ सुवि॑प्रः। तेन॑ य॒ज्ञेन॒ स्वरङ्कृतेन॒ स्विष्टेन व॒क्षणा॒ऽआ पृ॑णध्वम्॥२८॥

होता॑ अ॒ध्व॒र्युः। आव॑या॒ इत्याऽव॑याः। अ॒ग्नि॒मि॒न्ध इत्या॑ग्निम्ऽइ॒न्धः। ग्रा॒व॒ग्रा॒भ इति॑ ग्रावऽग्रा॒भः। उ॒त। शस्ता॑। सुवि॑प्र॒ इति॑ सुऽवि॑प्रः। तेन॑। य॒ज्ञेन॑। स्व॑रङ्कृते॒नेति॒ सुऽअ॑रङ्कृतेन। स्वि᳖ष्टे॒नेति॒ सुऽइ॑ष्टेन। व॒क्षणाः॑। आ। पृ॒ण॒ध्व॒म् ॥२८ ॥

Mantra without Swara
होताध्वर्युरावयाऽअग्निमिन्धो ग्रावग्राभऽउत शँस्ता सुविप्रः । तेन यज्ञेन स्वरङ्तेन स्विष्टेन वक्षणाऽआ पृणध्वम् ॥

होता अध्वर्युः। आवया इत्याऽवयाः। अग्निमिन्ध इत्याग्निम्ऽइन्धः। ग्रावग्राभ इति ग्रावऽग्राभः। उत। शस्ता। सुविप्र इति सुऽविप्रः। तेन। यज्ञेन। स्वरङ्कृतेनेति सुऽअरङ्कृतेन। स्विष्टेनेति सुऽइष्टेन। वक्षणाः। आ। पृणध्वम्॥२८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
-हे मनुष्यो ! जैसे--(होता) शुभ गुणों को ग्रहण करने वाला, (आवया:) यज्ञ करने वाला, (अग्निमिन्ध:) अग्नि को प्रदीप्त करने वाला, (ग्रावग्राभः) ग्रावा=मेघ को ग्रहण करने वाला, (शंस्ता) प्रशंसा करने वाला, (उत) और (सुविप्रः) उत्तम मेधावी विद्वानों वाला, (अध्वर्यु:) अहिंसा-यज्ञ का इच्छुक विद्वान्--जिस (स्वरङ्कृतेन) अत्यन्त अलंकृत (स्विष्टेन) अति प्रिय (यज्ञेन) यज्ञ से (वक्षणाः) नदियों को अलंकृत करता है; वैसे उस यज्ञ से तुम भी (आपृणध्वम्) सब ओर सुखी रहो ॥ २५ । २८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलंकार है। जो मनुष्य सुगन्धि आदि सुसंस्कृत हवियों को अग्नि में डालने से वायु और वर्षा-जल आदि को शुद्ध करके नदी आदि के जलों को शुद्ध करते हैं; वे सदा सुखी रहते हैं ॥ २५ । २८ ॥
Subject
मनुष्य क्या करें, इस विषय का फिर उपदेश किया है॥
Refrences
(वक्षणाः) नदीः। 'वक्षणा' पद निघं० (१। १३) में नदी-नामों में पठित है
Commentary Essence
मनुष्य क्या करें--शुभ गुणों को ग्रहण करने वाला, यज्ञ करने वाला, अग्नि को प्रदीप्त करने वाला, यज्ञ से मेघों को ग्रहण करने वाला, उत्तम मेधावी विद्वानों वाला, हिंसारहित यज्ञ का इच्छुक मनुष्य यज्ञ से नदियों को अलंकृत करे अर्थात् सुगन्धि आदि शुद्ध हवि को अग्नि में देकर वायु और वर्षा जल आदि को शुद्ध करके नदी आदि के जलों को शुद्ध करें तथा सदा सुखी रहें ॥ २५ । २८ ॥