Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 27

48 Mantra
25/27
Devata- यज्ञो देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यद्ध॑वि॒ष्यमृतु॒शो दे॑व॒यानं॒ त्रिर्मानु॑षाः॒ पर्यश्वं॒ नय॑न्ति।अत्रा॑ पू॒ष्णः प्र॑थ॒मो भा॒गऽए॑ति य॒ज्ञं दे॒वेभ्यः॑ प्रतिवे॒दय॑न्न॒जः॥२७॥

यत्। ह॒वि॒ष्य᳖म्। ऋ॒तु॒श इत्यृ॑तु॒ऽशः। दे॒व॒यान॒मिति॑ देव॒ऽयान॑म्। त्रिः। मानु॑षाः। परि॑। अश्व॑म्। नय॑न्ति। अत्र॑। पू॒ष्णः। प्र॒थ॒मः। भा॒गः। ए॒ति॒। य॒ज्ञम्। दे॒वेभ्यः॑। प्र॒ति॒वे॒दय॒न्निति॑ प्रतिऽवे॒दय॑न्। अ॒जः ॥२७ ॥

Mantra without Swara
यद्धविष्यमृतुशो देवयानन्त्रिर्मानुषाः पर्यश्वन्नयन्ति । अत्रा पूष्णः प्रथमो भाग एति यज्ञन्देवेभ्यः प्रतिवेदयन्नजः ॥

यत्। हविष्यम्। ऋतुश इत्यृतुऽशः। देवयानमिति देवऽयानम्। त्रिः। मानुषाः। परि। अश्वम्। नयन्ति। अत्र। पूष्णः। प्रथमः। भागः। एति। यज्ञम्। देवेभ्यः। प्रतिवेदयन्निति प्रतिऽवेदयन्। अजः॥२७॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
(यत्) जो मनुष्य (ऋतुश:) ऋतु अनुसार (हविष्यम्) हवि के लिए हितकारी उत्तम पदार्थ तथा (देवयानम्) देवों को देशान्तर में पहुँचाने वाले (अश्वम्) आशुगामी घोड़े को (त्रिः) तीन बार (परिनयन्ति) सब ओर ले जाते हैं; जो (अत्र) यहाँ (पूष्णः) पुष्टि का (प्रथमः) प्रथम (भागः) सेवन करने योग्य पदार्थ (देवेभ्यः) विद्वानों के लिए (यज्ञम्) यज्ञ को (प्रतिवेदयन्) जनाने वाला (अजः) बकरा (एति) प्राप्त होता है, वह सदा रक्षा करने योग्य है ॥ २५ । २७ ॥
Essence
जो मनुष्य ऋतु अनुसार आहार-विहार करते हैं; घोड़े और बकरे आदि पशुओं से संगत कार्य करते हैं; वे अत्यन्त सुख को प्राप्त करते हैं॥ २५ । २७ ॥
Subject
फिर किससे कौन क्या करते हैं, इस विषय का उपदेश किया है॥
Refrences
(अत्र) यहाँ 'ऋचि तुनुघ०' (६ | ३ | १३३) से संहिता में दीर्घ है [अत्रा]।
Commentary Essence
किससे कौन क्या करते हैं—मनुष्य ऋतु अनुसार हवि के लिए हितकारीपदार्थों का आहार-विहार करें। पुष्टि के लिए प्रथम सेवनीय तथा विद्वानों के लिए यज्ञ को सिद्ध करनेवाले बकरे को प्राप्त करें। तात्पर्य यह है कि घोड़े और बकरे आदि पशुओं से उचित कार्य करें तथा उनकी सदा रक्षा करके सुख को प्राप्त करें ॥ २५ । २७ ॥