Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 2

48 Mantra
25/2
Devata- प्राणादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगतिसक्वर्यौ Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
वातं॑ प्रा॒णेना॑पा॒नेन॒ नासि॑केऽउपया॒ममध॑रे॒णौष्ठे॑न॒ सदुत्त॑रेण प्रका॒शेनान्त॑रमनूका॒शेन॒ बाह्यं॑ निवे॒ष्यं मू॒र्ध्ना स्त॑नयि॒त्नुं नि॑र्बा॒धेना॒शनिं म॒स्तिष्के॑ण वि॒द्युतं॑ क॒नीन॑काभ्यां॒ कर्णा॑भ्या॒ श्रोत्र॒ श्रोत्रा॑भ्यां॒ कर्णौ॑ तेद॒नीम॑धरक॒ण्ठेना॒पः शु॑ष्कक॒ण्ठेन॑ चि॒त्तं मन्या॑भि॒रदि॑तिꣳ शी॒र्ष्णा निर्ऋ॑तिं॒ निर्ज॑र्जल्पेन शी॒र्ष्णा सं॑क्रो॒शैः प्रा॒णान् रे॒ष्माण॑ स्तु॒पेन॑॥२॥

वात॑म्। प्रा॒णेन॑। अ॒पा॒नेनेत्य॑पऽआ॒नेन॑। नासि॑के॒ इति॒ नासि॑के। उ॒प॒या॒ममित्यु॑प॒ऽया॒मम्। अध॑रेण। ओष्ठे॑न। सत्। उत्त॑रे॒णेत्युत्ऽत॑रेण। प्र॒का॒शेनेति॑ प्रऽका॒शेन॑। अन्त॑रम्। अ॒नू॒का॒शेन॑। अ॒नु॒का॒शेनेत्य॑नुऽका॒शेन॑। बाह्य॑म्। नि॒वे॒ष्यमिति॑ निऽवे॒ष्यम्। मू॒र्ध्ना। स्त॒न॒यि॒त्नुम्। नि॒र्बा॒धेने॒ति॑ निःऽबा॒धेन॑। अ॒शनि॑म्। म॒स्तिष्के॑ण। वि॒द्युत॒मिति॑ वि॒ऽद्युत॑म्। क॒नीन॑काभ्याम्। कर्णा॑भ्याम्। श्रोत्र॑म्। श्रोत्रा॑भ्याम्। कर्णौ॑। ते॒द॒नीम्। अ॒ध॒र॒क॒ण्ठेनेत्य॑धरऽक॒ण्ठेन॑। अ॒पः। शु॒ष्क॒क॒ण्ठेनेति॑ शुष्कऽक॒ण्ठेन॑। चि॒त्तम्। मन्या॑भिः ॥ अदि॑तिम्। शी॒र्ष्णा। निर्ऋ॑ति॒मिति॒ निःऽऋ॑तिम्। निर्ज॑र्जल्पे॒नेति॒ निःऽज॑र्जल्पेन। शी॒र्ष्णा। स॒ङ्क्रो॒शैरिति॑ सम्ऽक्रो॒शैः। प्रा॒णान्। रे॒ष्माण॑म्। स्तु॒पेन॑ ॥२ ॥

Mantra without Swara
वातम्प्राणेनापानेन नसिकेऽउपयाममधरेणौष्ठेन सदुत्तरेण प्रकाशेनान्तरमनूकाशेन बाह्व्यन्निवेष्यम्मूर्ध्ना स्तनयित्नुन्निर्बाधेनाशनिम्मस्तिष्केण विद्युतङ्कनीनकाभ्याङ्कर्णाभ्याँ श्रोत्रँ श्रोत्राभ्याङ्कर्णा तेदनीमधरकण्ठेनापः शुष्ककण्ठेन चित्तम्मन्याभिरदितिँ शीर्ष्णानिरृतिन्निर्जर्जल्पेन शीर्ष्णा सङ्क्रोशैः प्राणान्रेष्माणँ स्तुपेन् ॥

वातम्। प्राणेन। अपानेनेत्यपऽआनेन। नासिके इति नासिके। उपयाममित्युपऽयामम्। अधरेण। ओष्ठेन। सत्। उत्तरेणेत्युत्ऽतरेण। प्रकाशेनेति प्रऽकाशेन। अन्तरम्। अनूकाशेन। अनुकाशेनेत्यनुऽकाशेन। बाह्यम्। निवेष्यमिति निऽवेष्यम्। मूर्ध्ना। स्तनयित्नुम्। निर्बाधेनेति निःऽबाधेन। अशनिम्। मस्तिष्केण। विद्युतमिति विऽद्युतम्। कनीनकाभ्याम्। कर्णाभ्याम्। श्रोत्रम्। श्रोत्राभ्याम्। कर्णौ। तेदनीम्। अधरकण्ठेनेत्यधरऽकण्ठेन। अपः। शुष्ककण्ठेनेति शुष्कऽकण्ठेन। चित्तम्। मन्याभिः॥ अदितिम्। शीर्ष्णा। निर्ऋतिमिति निःऽऋतिम्। निर्जर्जल्पेनेति निःऽजर्जल्पेन। शीर्ष्णा। सङ्क्रोशैरिति सम्ऽक्रोशैः। प्राणान्। रेष्माणम्। स्तुपेन॥२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे जिज्ञासु ! मेरे उपदेश के ग्रहण से तू--(प्राणेन) प्राण एवं (अपानेन) अपान से (वातम्) वायु, (नासिके) नासिका के दो छिद्र तथा (उपयामम्) स्वीकृत नियम को; (अधरेण) मुख के नीचे (ओष्ठेन) ओष्ठ से एवं (उत्तरेण) ऊपर के (प्रकाशेन) प्रकाश से (सत्) श्रेष्ठ (अन्तरम्) अन्दर की वस्तु को; (अनूकाशेन) अनुकूल प्रकाश से (बाह्यम्) बाहर की वस्तु को, (मूर्ध्ना) मस्तक से (निवेष्यम्) निश्चय से प्राप्त करने योग्य ज्ञान को; (निर्बाधेन) नितान्त बाधा के कारण (स्तनयित्नुम्) शब्द की निमित्त (अशनिम्) व्यापक, घोष युक्त विद्युत् को, (मस्तिष्केण) शिर में स्थित मज्जा के तन्तु समूह से (विद्युत्) विशेष प्रकाशमान विद्युत् को; (कनीनकाभ्याम्) प्रदीप्त एवं कमनीय (कर्णाभ्याम्) सुनने के साधनों से (कर्णौ) कानों को; (श्रोत्राभ्याम्) सुनने के साधन कानों के गोलकों से (श्रोत्रम्) श्रवण-शक्ति को तथा (तेदनीम्) श्रवण-क्रिया को, (अधरकण्ठेन) नीचे के कण्ठ से (अपः) जलों को, (शुष्ककण्ठेन) शुष्क कण्ठ से (चित्तम्) विज्ञान की साधक अन्त:करण की वृत्ति को, (मन्याभिः) विज्ञान-क्रियाओं से (अदितिम्) अविनाशक प्रज्ञा= बुद्धि को, (शीर्ष्णा) शिर से (निर्ॠतिम्) भूमि को, (निर्जर्जल्पेन) नितान्त जर्जरीभूत (शीर्ष्णा) शिर से एवं (संक्रोश:) संक्रोश=उत्तम आह्वानों से (प्राणान्) प्राणों को प्राप्त कर। (स्तुपेन) हिंसा से (रेष्माणम्) हिंसक अविद्या आदि रोगों का (हिन्धि) विनाश कर ॥ २५ । २ ॥
Essence
सब मनुष्य प्रथम आयु में शरीर आदि साधनों से शरीर और आत्मा के बल को सिद्ध करें। अविद्या, कुशिक्षा और कुशील=कुस्वभाव आदि रोगों का विनाश करें ॥ २५ । २॥
Subject
किससे क्या करना चाहिए, यह फिर उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
अध्यापक एवं उपदेशक लोगों के उपदेश को ग्रहण करके जिज्ञासु लोगप्राण-अपान से वायु, नासिका के दोनों छिद्रों एवं नियम को, नीचे के ओष्ठ और ऊपर के प्रकाश से अन्दर की वस्तु को, अनुकूल प्रकाश से बाहर की वस्तु को, मस्तक से निश्चय से प्राप्त करने योग्य ज्ञान को, नितान्त बाधक वस्तु से शब्द-निमित्त विद्युत् को, शिर के मज्जा-तन्तुओं से विशेष प्रकाशमान विद्युत् को, कनीनक=आंखों के प्रदीप्त एवं कमनीय तारकों एवं श्रवण-साधनों से कानों को, कानों के गोलकों से श्रवणशक्ति को, कण्ठ के अधोभाग से जलों को, शुष्क कण्ठ से विज्ञान की साधक अन्तःकरण की वृत्ति को, विज्ञान की क्रियाओं से प्रज्ञा=बुद्धि को, शिर से भूमि को, नितान्त जर्जरीभूत शिर एवं आह्वानों से प्राणों को प्राप्त करें।
सब मनुष्य आयु के प्रथम भाग में शरीर आदि साधनों से शरीर और आत्मा के बल को सिद्ध करें । अविद्या, कुशिक्षा, कुशील आदि रोगों का सर्वथा हनन करें ॥ २५ । २ ॥