Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 25 / Mantra 1

48 Mantra
25/1
Devata- सरस्वत्यादयो देवताः Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिक्छक्वरी, निचृतदतिशक्वरी Swara- धैवतः, पञ्चमः
Mantra with Swara
शादं॑ द॒द्भिरव॑कां दन्तमू॒लैर्मृदं॒ बर्स्वै॑स्ते॒ गां दष्ट्रा॑भ्या॒सर॑स्वत्याऽअग्रजि॒ह्वं जि॒ह्वाया॑ऽ उत्सा॒दम॑वक्र॒न्देन॒ तालु॒ वाज॒ꣳहनु॑भ्याम॒पऽआ॒स्येन॒ वृष॑णमा॒ण्डाभ्या॑मादि॒त्याँ श्मश्रु॑भिः॒ पन्था॑नं भ्रू॒भ्यां द्यावा॑पृथि॒वी वर्त्तो॑भ्यां वि॒द्युतं॑ क॒नीन॑काभ्या शु॒क्राय॒ स्वाहा॑ कृ॒ष्णाय॒ स्वाहा॒ पार्या॑णि॒ पक्ष्मा॑ण्यवा॒र्याऽइ॒क्षवो॑ऽवा॒र्याणि॒ पक्ष्मा॑णि॒ पार्या॑ इ॒क्षवः॑॥१॥

शाद॑म्। द॒द्भिरिति॑ द॒त्ऽभिः। अव॑काम्। द॒न्त॒मू॒लैरिति॑ दन्तऽमू॒लैः। मृद॑म्। बर्स्वैः॑। ते॒। गाम्। दष्ट्रा॑भ्याम्। सर॑स्वत्यै। अ॒ग्र॒जि॒ह्वमित्य॑ग्रऽजि॒ह्वम्। जि॒ह्वायाः॑। उ॒त्सा॒दमित्यु॑त्ऽसा॒दम्। अ॒व॒क्रन्देनेत्य॑वऽक्र॒न्देन॑। तालु॑। वाज॑म्। हनु॑भ्या॒मिति॒ हनु॑ऽभ्याम्। अ॒पः। आ॒स्ये᳖न। वृष॑णम्। आ॒ण्डाभ्या॑म्। आ॒दि॒त्यान्। श्मश्रु॑भि॒रिति॒ श्मश्रु॑ऽभिः। पन्था॑नम्। भ्रू॒भ्याम्। द्यावा॑पृथि॒वी इति॒ द्यावा॑पृथि॒वी। वर्त्तो॑भ्या॒मिति॒ वर्त्तः॑ऽभ्याम्। वि॒द्युत॑मिति॒ वि॒ऽद्युत॑म्। क॒नीन॑काभ्याम्। शु॒क्राय॑। स्वाहा॑। कृ॒ष्णाय॑। स्वाहा॑। पार्या॑णि। पक्ष्मा॑णि। अ॒वा॒र्याः᳖। इ॒क्षवः॑। अ॒वा॒र्या᳖णि। पक्ष्मा॑णि। पार्याः॑। इ॒क्षवः॑ ॥१ ॥

Mantra without Swara
शादन्दद्भिरवकान्दन्तमूलैर्मृदम्बर्स्वैस्तेगान्दँष्ट्राभ्याढँ सरस्वत्याऽअग्रजिह्वञ्जिह्वायाऽउत्सादमवक्रन्देन तालु वाजँ हनुभ्यामपऽआस्येन वृषणमाण्डाभ्यामात्याँश्मश्रुभिः पन्थानम्भ्रूभ्यान्द्यावापृथिवी वर्ताभ्याँविद्युतङ्कनीनकाभ्याँ शुक्लाय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा पार्याणि पक्ष्माण्यवार्या इक्षवो वार्याणि पक्ष्माणि पार्या इक्षवः ॥

शादम्। दद्भिरिति दत्ऽभिः। अवकाम्। दन्तमूलैरिति दन्तऽमूलैः। मृदम्। बर्स्वैः। ते। गाम्। दष्ट्राभ्याम्। सरस्वत्यै। अग्रजिह्वमित्यग्रऽजिह्वम्। जिह्वायाः। उत्सादमित्युत्ऽसादम्। अवक्रन्देनेत्यवऽक्रन्देन। तालु। वाजम्। हनुभ्यामिति हनुऽभ्याम्। अपः। आस्येन। वृषणम्। आण्डाभ्याम्। आदित्यान्। श्मश्रुभिरिति श्मश्रुऽभिः। पन्थानम्। भ्रूभ्याम्। द्यावापृथिवी इति द्यावापृथिवी। वर्त्तोभ्यामिति वर्त्तःऽभ्याम्। विद्युतमिति विऽद्युतम्। कनीनकाभ्याम्। शुक्राय। स्वाहा। कृष्णाय। स्वाहा। पार्याणि। पक्ष्माणि। अवार्याः। इक्षवः। अवार्याणि। पक्ष्माणि। पार्याः। इक्षवः॥१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे जिज्ञासु विद्यार्थी! (ते) तुझे(दद्भिः) दांतों से (शादम्) भक्ष्य पदार्थों के छेदक मुख, (दन्तमूलैः) दांतों के मूल एवं (बर्स्वै:) दांतों के पृष्ठ भागों से (अवकाम्) रक्षक (मृदम्) मिट्टी, (दंष्ट्राभ्याम्) दाढ़ एवं (सरस्वत्यै) प्रशस्त विज्ञानवती वाणी से (गाम्) वाणी, (जिह्वायाः) जिह्वा से (अग्रजिह्वम्) जिह्वा के अग्रभाग, (अवक्रन्देन) विकलता के अभाव से (उत्सादम्) वर्णों के ऊर्ध्व स्थान (तालु) तालु, (हनुभ्याम्) ठोडी के दो भागों से (वाजम्) अन्न, (आस्येन) भक्ष्य पदार्थों को गीला करने वाले मुख से (अप:) जल, (आण्डाभ्याम्) वीर्य के आधार अण्डकोशों से (वृषणम्) वीर्य की वर्षा करने वाले लिंग, (श्मश्रुभिः) मुख के केश अर्थात् मूछों से (आदित्यान्) मुख्य विद्वान्, (भ्रूभ्याम् ) नेत्र-गोलक के ऊर्ध्व भाग अर्थात् भौं से (पन्थानम्) मार्ग, (वर्त्तोभ्याम्) जाने-आने से (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि, (कनीनकाभ्याम्) तेजोमय कृष्ण गोल तारकों से (विद्युतम्) विद्युत् का मैं बोध करता हूँ । तू--(शुक्राय) वीर्य के लिए (स्वाहा) ब्रह्मचर्य का आचरण, (कृष्णाय) विद्या के आकर्षण के लिए (स्वाहा) सुशीलता युक्त आचरण, (पार्याणि) पूरे करने योग्य वचन, (पक्ष्माणि) स्वीकार करने योग्य कर्म वा नेत्रों के ऊर्ध्व भाग के लोम, (अवार्या:) नदी आदि के अवर देश में होने वाले (इक्षव:) ईख, (अवार्याणि) अवर अवस्था के (पक्ष्माणि) स्वीकार करने योग्य कर्म वा लोम और (पार्या:) पालन करने योग्य (इक्षव:) ईख हैं; उन्हें ग्रहण कर ॥ २५ । १ ॥
Essence
अध्यापक लोग शिष्यों के अंगों को उपदेश से पुष्ट बनाकर, आहार-विहार आदि को ठीक-ठीक जनाकर, सब विद्याओं को प्राप्त कराकर, अखण्डित ब्रह्मचर्य का सेवन कराकर, ऐश्वर्य को प्राप्त कराकर सुखी बनावें ॥ २५ । १ ॥
Subject
इसके प्रथम मन्त्र में किससे क्या करना चाहिए, इस विषय का उपदेश किया है ।
Commentary Essence
अध्यापक लोग जिज्ञासु विद्यार्थियों को दांतों से मुख को, दन्तमूलों और दन्तपृष्ठों से रक्षक मृत्तिका को, दाढ़ों एवं प्रशस्त विज्ञानवती वाक् से वाणी को, जिह्वा से जिह्वा के अग्रभाग को, विकलता के प्रभाव से वर्गों के ऊर्ध्व स्थान तालु को, ठोढ़ी के दोनों भागों से अन्न को, मुख से जलों को, वीर्य के आधार अण्ड-कोषों से लिंग को, मूँछों से मुख्य विद्वानों को, भ्रुवों से मार्ग को, गमन-आगमन से सूर्य और भूमि को, कनीनक= आँखों के तेजोमय कृष्ण गोल तारकों से विद्युत् को जनावें। जिज्ञासु विद्यार्थी लोग--वीर्य के लिए ब्रह्मचर्य का आचरण, विद्या के आकर्षण (ग्रहण) के लिए, सुशीलता युक्त आचरण करें। पूरे करने योग्य एवं स्वीकार करने योग्य कर्मों को ग्रहण करें। नदी के अवर भाग एवं परभाग में होने वाले ईख को ग्रहण करें ॥ २५ । १ ॥