Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 91

117 Mantra
12/91
Devata- वैद्या देवताः Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒व॒पत॑न्तीरवदन् दि॒वऽओष॑धय॒स्परि॑। यं जी॒वम॒श्नवा॑महै॒ न स रि॑ष्याति॒ पूरु॑षः॥९१॥

अ॒व॒पत॑न्ती॒रित्य॑व॒ऽपत॑न्तीः। अ॒व॒द॒न्। दि॒वः। ओष॑धयः। परि॑। यम्। जी॒वम्। अ॒श्नवा॑महै। नः। सः। रि॒ष्या॒ति॒। पूरु॑षः। पूरु॑ष॒ इति॒ पुरु॑षः ॥९१ ॥

Mantra without Swara
अवपतन्तीरवदन्दिवऽओषधयस्परि । यञ्जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः ॥

अवपतन्तीरित्यवऽपतन्तीः। अवदन्। दिवः। ओषधयः। परि। यम्। जीवम्। अश्नवामहै। नः। सः। रिष्याति। पूरुषः। पूरुष इति पुरुषः॥९१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हम जो (दिवः) प्रकाश से (अवपतन्तीः) नीचे आती हुई (ओषधयः) सोम आदि ओषधियाँ हैं, जिनका विद्वान् लोग (परि + अवदन्) सब ओर उपदेश करते हैं, जिनसे (यम्) जिस (जीवम्) प्राणों को धारण करने वाले जीव को (अश्नवामहै) प्राप्त करते हैं, जिनका सेवन करके (सः) वह (पूरुषः) पुरुष (न रिष्याति) रोगों से कभी पीड़ित नहीं होता, उनका सेवन करें ।।
Essence
विद्वान् सब मनुष्यों को दिव्य ओषधियों की विद्या को प्रदान करें, जिससे दीर्घ जीवन को सब प्राप्त करें। इन ओषधियों को कोई कभी नष्ट न करे ।
Subject
अध्यापक लोग सब को उत्तम ओषधि जनावें, यह उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
वैद्यों का उत्तम कर्त्तव्य -- जितनी भी ओषधियाँ जीवनप्रद हैं, जिनके सेवन से रोग पीड़ित नहीं करते, उनको विद्वान् वैद्य अच्छी प्रकार जानकर दूसरों को भी उपदेश करें। और जीवनप्रद ओषधियों को नष्ट होने से सदा बचावें। जिससे रोगों की निवृत्ति होकर मनुष्यों की आयु बढ़ती रहे ।। १२ । ९१ ॥