Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 90

117 Mantra
12/90
Devata- वैद्या देवताः Rishi- भिषगृषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
मु॒ञ्चन्तु॑ मा शप॒थ्यादथो॑ वरु॒ण्यादु॒त। अथो॑ य॒मस्य॒ पड्वी॑शात् सर्व॑स्माद् देवकिल्वि॒षात्॥९०॥

मु॒ञ्चन्तु॑। मा॒। श॒प॒थ्या᳕त्। अथो॒ऽइत्यथो॑। व॒रु॒ण्या᳖त्। उ॒त। अथो॒ऽइत्यथो॑। य॒मस्य॑। पड्वी॑शात्। सर्व॑स्मात्। दे॒व॒कि॒ल्वि॒षादिति॑ देवऽकि॒ल्वि॒षात् ॥९० ॥

Mantra without Swara
मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत । अथो यमस्य पड्वीशात्सर्वस्माद्देवकिल्बिषात् ॥

मुञ्चन्तु। मा। शपथ्यात्। अथोऽइत्यथो। वरुण्यात्। उत। अथोऽइत्यथो। यमस्य। पड्वीशात्। सर्वस्मात्। देवकिल्विषादिति देवऽकिल्विषात्॥९०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वानो ! आप, जैसे ओषधियाँ रोग से पृथक् रखती हैं वैसे (शपथ्यात्) शपथ-सम्बन्धी कर्म से, (अथो) और (वरुण्यात्) श्रेष्ठ जनों में होने वाले अपराध से, (यमस्य) न्यायाधीश के (पड्वीशात्) न्याय-विरुद्ध आचरण से, (उत) और (सर्वस्मात्) सब (देवकिल्विषात्) विद्वानों में होने वाले अपराध के कारण से (मा) मुझे (मुञ्चन्तु) पृथक् रखो। वैसे ओषधियाँ तुमको भी रोगों से (मुञ्चन्तु ) पृथक् रखें ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलंकार है । मनुष्य प्रमादकारी औषध को छोड़कर अन्य का सेवन करें । सौगन्ध (शपथ) कभी न खावें, श्रेष्ठों के प्रति अपराध, न्याय के विरोध, पापाचारण, मूर्खो के समान ईर्ष्या विषय से पृथक् होकर अनुकूलता से वर्ताव करें ।। १२ । ९० ॥
Subject
कौन-कौन ओषधि किस-किस से छुड़ाती है, यह उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
१. विद्वान् वैद्यों का धर्म--उत्तम वैद्यों को चाहिए कि जैसे ओषधियों से शारीरिक रोगों से सुरक्षा करते हैं वैसे ही मानसिक अपराधों से अर्थात् मिथ्या शपथ से, सज्जनों के प्रति अनादर भाव से, और न्याय विरुद्ध आचरण से सदा मनुष्यों को बचावें। जो विद्वान्, सदाचारी तथा परोपकारी देव तुल्य मनुष्य हों उनके प्रति जो भी अपराध करते हों, उनसे सदा रक्षा करें ।
२. अलङ्कार - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ओषधियाँ रोगों से बचाती हैं, वैसे ही विद्वान् पुरुष मानसिक दोषों से सदा सुरक्षा करें ।। १२ । ९० ।।