Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 89

117 Mantra
12/89
Devata- वैद्या देवताः Rishi- भिषगृषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
याः फ॒लिनी॒र्याऽअ॑फ॒लाऽअ॑पु॒ष्पा याश्च॑ पु॒ष्पिणीः॑। बृह॒स्पति॑प्रसूता॒स्ता नो॑ मुञ्च॒न्त्वꣳह॑सः॥८९॥

याः। फ॒लिनीः॑। याः। अ॒फ॒लाः अ॒पु॒ष्पाः। याः। च॒। पु॒ष्पिणीः॑। बृह॒स्पति॑प्रसूता॒ इति॒ बृह॒स्पति॑ऽप्रसूताः। ताः। नः॒। मु॒ञ्च॒न्तु। अꣳह॑सः ॥८९ ॥

Mantra without Swara
याः पलिनीर्याऽअपलाऽअपुष्पा याश्च पुष्पिणीः । बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वँहसः ॥

याः। फलिनीः। याः। अफलाः अपुष्पाः। याः। च। पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूता इति बृहस्पतिऽप्रसूताः। ताः। नः। मुञ्चन्तु। अꣳहसः॥८९॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! (याः) जो (फलिनीः) बहुत फलों वाली, (याः) जो (अफलाः) फलों से रहित, (याः) जो (अपुष्पाः) पुष्पों से रहित, और (याः) जो (पुष्पिणीः) बहुत पुष्पों वाली (बृहस्पतिप्रसूताः) बृहस्पति=ईश्वर के द्वारा उत्पन्न की हुई ओषधियाँ हैं, वे (नः) हमें (अंहसः) रोगजन्य दुःख से जैसे (मुञ्चन्तु) मुक्त करती हैं, वैसे वे तुम्हें भी मुक्त करें ।। १२ । ८९ ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है। मनुष्य, जो ईश्वर ने सब प्राणियों के जीवन और रोगनिवारण के लिए ओषधियाँ बनाई हैं, उनसे वैद्यकशास्त्र में प्रतिपादित उपयोग लेकर सब रोगों को नष्ट करके, पापाचरण से दूर रह कर, धर्म में नित्य प्रवृत्त रहें ।। १२ । ८९ ।।
Subject
रोगों के निवारण के लिए ही ओषधियाँ ईश्वर ने रची हैं, यह उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
१. ओषधियों की रोगनिवारणार्थ उत्पत्ति-- बृहस्पति परमेश्वर ने जो भी फलों से युक्त अथवा फलरहित, पुष्पों से युक्त अथवा पुष्पों से रहित ओषधियाँ बनाई हैं, वे सभी रोग-निवारक हैं । अतः इनका विशेष ज्ञान करके रोगों को दूर करना चाहिये।
२. अलङ्कार - इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे रोगों के निवारणार्थ परमेश्वर ने सब ओषधियों को बनाया है, वैसे ही वैद्य उनका विशेष ज्ञान करके रोगों का निवारण करते रहें ।। १२ । ८९।।