Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 83

117 Mantra
12/83
Devata- वैद्या देवताः Rishi- भिषगृषिः Chhand- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इष्कृ॑ति॒र्नाम॑ वो मा॒ताथो॑ यू॒यꣳ स्थ॒ निष्कृ॑तीः। सी॒राः प॑त॒त्रिणी॑ स्थन॒ यदा॒मय॑ति॒ निष्कृ॑थ॥८३॥

इष्कृ॑तिः। नाम॑। वः॒। मा॒ता। अथो॒ऽइत्यथो॑। यू॒यम्। स्थ॒। निष्कृ॑तीः। निष्कृ॑ती॒रिति॒ निःऽकृ॑तीः। सी॒राः। प॒त॒त्रिणीः॑। स्थ॒न॒। यत्। आ॒मय॑ति। निः। कृ॒थ॒ ॥८३ ॥

Mantra without Swara
इष्कृतिर्नाम वो माताथो यूयँ स्थ निष्कृतीः । सीराः पतत्रिणी स्थन यदामयति निष्कृथ ॥

इष्कृतिः। नाम। वः। माता। अथोऽइत्यथो। यूयम्। स्थ। निष्कृतीः। निष्कृतीरिति निःऽकृतीः। सीराः। पतत्रिणीः। स्थन। यत्। आमयति। निः। कृथ॥८३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम जो (वः) आपकी (इष्कृतिः) उपकार करने वाली (माता) जननी के समान (नाम) प्रसिद्ध ओषधि है, उसके सेवन करने वालों के समान ओषधि के सेवन करने वाले (स्थ) बनो, और (पतत्रिणीः) गतिशील (सीराः) नदियों के समान (निष्कृती:) प्रत्युपकार करने वाले (स्थन) बनो, और (यत्) जो क्रिया (आमयति) रोगों को उत्पन्न करती है उसे (नि:+कृथ) सर्वथा दूर करो ।। १२ । ८३ ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ॥ हे मनुष्यो ! जैसे माता-पिता तुम्हारी सेवा करते हैं वैसे तुम भी इनकी सेवा करो ।
जो-जो कर्म रोगों को बढ़ाता है, उस-उस को छोड़ो, इस प्रकार उत्तम रीति से सेवन की हुई ओषधियाँ माता के तुल्य पोषण करती हैं ।।
Subject
अच्छे प्रकार सेवन की हुई ओषधियाँ क्या करती हैं, यह उपदेश किया है।।
Refrences
'सीरा:' यहाँ सीर शब्द निघण्टु (१ । १३) में सीर के नामों में पढ़ा है । 'कृथ' यहाँ उकारविकरण विकरण व्यत्यय से लुक् हुआ है ।
Commentary Essence
१. ओषधियों के लाभ--(१) जैसे माता उपकार करने वाली होती है, वैसे ही ओषधियाँ भी उपकार करती हैं। अतः इनकी सुरक्षा माता की तरह करनी चाहिये। (२) और जिन कर्मों के करने से रोग पैदा होते हैं उनका परित्याग करके ओषधियों का सेवन करना चाहिये। तभी रोगों के निवारण में सोमादि ओषधियाँ समर्थ होती हैं, अन्यथा नहीं। (३) ओषधियाँ उसी प्रकार गतिशील बनाने वाली होती हैं जिस प्रकार नदियाँ गति वाली होकर सदा परोपकारार्थ ही गति करती रहती हैं ।
२. अलङ्कार-- इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे माता सन्तान का निरन्तर लाभ ही करती है वैसे ओषधियाँ भी सदा लाभ देने वाली होती हैं ।। १२ । ८३ ।।