Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 82

117 Mantra
12/82
Devata- ओषधयो देवताः Rishi- भिषगृषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
उच्छुष्मा॒ ओष॑धीनां॒ गावो॑ गो॒ष्ठादि॑वेरते। धन॑ꣳ सनि॒ष्यन्ती॑नामा॒त्मानं॒ तव॑ पूरुष॥८२॥

उत्। शुष्माः॑। ओष॑धीनाम्। गावः॑। गो॒ष्ठादि॑व। गो॒स्थादि॒वेति॑ गो॒स्थात्ऽइ॑व। ई॒र॒ते॒। धन॑म्। स॒नि॒ष्यन्ती॑नाम्। आ॒त्मान॑म्। तव॑। पू॒रु॒ष॒। पु॒रु॒षेति॑ पुरुष ॥८२ ॥

Mantra without Swara
उच्छुष्मा ओषधीनाङ्गावो गोष्ठादिवेरते । धनँ सनिष्यन्तीनामात्मानन्तव पूरुष ॥

उत्। शुष्माः। ओषधीनाम्। गावः। गोष्ठादिव। गोस्थादिवेति गोस्थात्ऽइव। ईरते। धनम्। सनिष्यन्तीनाम्। आत्मानम्। तव। पूरुष। पुरुषेति पुरुष॥८२॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (पुरुष) पुर अर्थात् देह में शयन करने वाले वा देह को धारण करने वाले जीव! जो (धनम्) वृद्धि के हेतु धन को (सनिष्यन्तीनाम्) प्राप्त कराने वाली (ओषधीनाम्) सोम, यव आदि ओषधियों में (शुष्माः) उत्तम बलकारी हैं, और जो (गावः) गौवें वा किरणें (गोष्ठादिव) जैसे अपने स्थान से तेरे (आत्मानम्) शरीर के अधिष्ठाता आत्मा को (उत् + ईरते) बछड़े प्राप्त कराती हैं, उन औषधियों का सेवन एवं उनके गौओं की सेवा कर ।। १२ । ८२ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलंकार है॥ हे मनुष्यो! जैसे पालन की हुई गौवें दुग्ध आदि से अपने बछड़ों और मनुष्य आदि का पोषण करके बल प्रदान करती हैं वैसे ओषधियाँ आपके आत्मा और शरीर का पोषण करके पराक्रम को बढ़ाती हैं।
यदि कोई अन्न आदि औषध का सेवन न करे होवे, अतः ये गायें और ओषधियाँ शरीर और आत्मा के लिए हैं, ऐसा जानो ।। १२ । ८२ ।।
Subject
मनुष्यों को नित्य पुरुषार्थ बढ़ाना चाहिये, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
'अश्वावतीम्' 'सोमावतीम्' इन दोनों पदों में मतुप् प्रत्यय के परे दीर्घ हुआ है।।
Commentary Essence
१. ओषधियों के लाभ--जैसे गायें पौष्टिक दूधादि से बछड़ों तथा मनुष्यों का पालन करती हैं, वैसे ही ओषधियाँ (यव सोमादि) बल को बढ़ाने वाली होती हैं। शारीरिक बल के बढ़ने से ओषधियाँ (धनम्) तृप्ति तथा वृद्धि के कारणभूत धन को प्राप्त कराने वाली हैं। विधि के अनुसार ओषधियों के सेवन से आत्मिक शक्ति की प्राप्ति भी होती है।
२. अलङ्कार-- इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। उपमा यह है कि जैसे गौवें दूधादि से मनुष्यों का पोषण करती हैं, वैसे ही ओषधियाँ भी आत्मिक तथा शारीरिक बल को प्रदान करती हैं ।