Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 8

117 Mantra
12/8
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्ने॑ऽअङ्गिरः श॒तं ते॑ सन्त्वा॒वृतः॑ सह॒स्रं॑ तऽउपा॒वृतः॑। अधा॒ पोष॑स्य॒ पोषे॑ण॒ पुन॑र्नो न॒ष्टमाकृ॑धि॒ पुन॑र्नो र॒यिमाकृ॑धि॥८॥

अग्ने॑। अ॒ङ्गि॒रः॒। श॒तम्। ते॒। स॒न्तु॒। आ॒वृत॒ इत्या॒ऽवृ॑तः। स॒हस्र॑म्। ते॒। उ॒पा॒वृत॒ इत्यु॑पऽआ॒वृतः॑। अध॑। पोष॑स्य। पोषे॑ण। पुनः॑। नः॒। न॒ष्टम्। आ। कृ॒धि॒। पुनः॑। नः॒। र॒यिम्। आ। कृ॒धि॒ ॥८ ॥

Mantra without Swara
अग्नेऽअङ्गिरः शतन्ते सन्त्वावृतः सहस्रन्तऽउपावृतः । अधा पोषस्य पोषेण पुनर्ना नष्टमाकृधि पुनर्ना रयिमाकृधि ॥

अग्ने। अङ्गिरः। शतम्। ते। सन्तु। आवृत इत्याऽवृतः। सहस्रम्। ते। उपावृत इत्युपऽआवृतः। अध। पोषस्य। पोषेण। पुनः। नः। नष्टम्। आ। कृधि। पुनः। नः। रयिम्। आ। कृधि॥८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
भाषार्थ--हे (अग्ने) पदार्थ-विद्या के वेत्ता (अङ्गिरः) विद्या के रसिक विद्वान्! (ते) तुझ पुरुषार्थी की अग्नि के समान (शतम्) सैंकड़ों (आवृत्तः) विद्या की प्रवृत्ति रूप क्रियाएँ तथा (सहस्रम्) हजारों (ते) आपकी (उपावृतः) भोगों की उपावृत्तियाँ (सन्तु) होवें।
(अध) और--आप इनसे (पोषस्य) पोषक मनुष्य के (पोषण) पालन से (नष्टम्) परोक्ष विज्ञान को भी (नः) हमारे लिए (पुनः) फिर (आ+कृधि) प्रत्यक्ष कीजिये, (रयिम्) प्रशस्त ऐश्वर्य को [नः] हमारे लिए (पुनः) फिर (आ+कृधि) उत्पन्न कीजिये ।। १२ । ८ ।।
Essence
मनुष्य विद्याओं में सैंकड़ों आवृत्तियाँ करके और शिल्प विद्याओं में हजार उपावृत्तियाँ भोगों की प्राप्ति करके--
गुप्त और अगुप्त विद्याओं को प्रकाशित करके सबके लिये ऐश्वर्यसुख को उत्पन्न करें।
Subject
फिर विद्याभ्यास करना चाहिये, यह उपदेश किया है ।।
Refrences
'अधा' इस पद में 'निपातस्य च' इस पाणिनीय सूत्र से दीर्घ हुआ है ।
Commentary Essence
विद्वद्-धर्म--विद्या के रसिक विद्वान् को योग्य है कि वह सभी प्रकार की पदार्थ विद्याओं का ज्ञाता हो। और गुप्तागुप्त विद्याओं को बार-बार अभ्यास करके सर्वजनहिताय सदा प्रकाशित करता रहे। जिससे सभी प्रकार का ऐश्वर्य बढ़ने से सुख की वृद्धि होती रहे ।। १२ । ८ ।।