Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 74

117 Mantra
12/74
Devata- अश्विनौ देवते Rishi- कुमारहारित ऋषिः Chhand- आर्षी जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
स॒जूरब्दो॒ऽअय॑वोभिः स॒जूरु॒षाऽअरु॑णीभिः। स॒जोष॑साव॒श्विना॒ दꣳसो॑भिः स॒जूः सूर॒ऽएत॑शेन स॒जूर्वै॑श्वान॒रऽइड॑या घृ॒तेन॒ स्वाहा॑॥७४॥

स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। अब्दः॑। अय॑वोभि॒रित्यय॑वःऽभिः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। उ॒षाः। अरु॑णीभिः। स॒जोष॑सा॒विति॑ स॒जोष॑ऽसौ। अ॒श्विना॑। दꣳसो॑भि॒रिति॒ दꣳसः॑ऽभिः। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। सूरः॑। एत॑शेन। स॒जूरिति॑ स॒ऽजूः। वै॒श्वा॒न॒रः। इड॑या। घृ॒तेन॑। स्वाहा॑ ॥७४ ॥

Mantra without Swara
सजूरब्दोऽअयवोभिः सजूरुषा अरुणीभिः सजोषसावश्विना दँसोभिः सजूः सूरऽएतशेन सजूर्वैश्वानरऽइडया घृतेन स्वाहा ॥

सजूरिति सऽजूः। अब्दः। अयवोभिरित्ययवःऽभिः। सजूरिति सऽजूः। उषाः। अरुणीभिः। सजोषसाविति सजोषऽसौ। अश्विना। दꣳसोभिरिति दꣳसःऽभिः। सजूरिति सऽजूः। सूरः। एतशेन। सजूरिति सऽजूः। वैश्वानरः। इडया। घृतेन। स्वाहा॥७४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! हम सब स्त्रीपुरुष-- जैसे (अयवोभिः) मिश्रित-अमिश्रित अन्न एवं क्षण आदि काल के अवयवों से (सजूः) संयुक्त (अब्दः) संवत्सर है, (अरुणीभिः) रक्तप्रभा आदि से (सजूः) युक्त (उषाः) प्रभातकाल है, (दंसोभिः) कर्मों के द्वारा (सजोषसौ) परस्पर समान रूप से सेवा करने वाले (अश्विनौ) प्राण-अपान के समान दम्पती हैं, (एतशेन) अश्व के समान व्याप्तिशील, वेगवान्, किरणों के निमित्त वायु के (सजूः) सहित (सूरः) सूर्य है, और (इडया) कार्य रूप अन्नादि (घृतेन) जल तथा (स्वाहा) सत्य वाणी से (सजूः) युक्त (वैश्वानरः) विद्युत् रूप अग्नि है—वैसे ही प्रीति से संयुक्त रहें ।। १२ । ७४ ।।
Essence
मनुष्यों में परस्पर जितना सौहार्द=मित्रता होती है उतना ही सुख तथा जितना दौहार्द=शत्रुता होती है उतना ही दुःख उत्पन्न होता है। अतः सब स्त्री-पुरुष परोपकार से संयुक्त होकर ही सदा वर्ताव करें ।। १२ । ७४ ।।
Subject
मनुष्यों को किस प्रकार परस्पर सुखी होना चाहिये, यह उपदेश किया है ॥
Commentary Essence
सौहार्द ही दाम्पत्य जीवन का सुख --गृहस्थाश्रम में स्त्री-पुरुष परस्पर सौहार्द भाव से इस प्रकार रहें जैसे क्षणादि काल के अवयव संवत्सर से संयुक्त हैं, जैसे प्रभातकाल रक्तप्रभा से संयुक्त है, जैसे परस्पर समान रूप से सेवा करने वाले प्राण-अपान संबद्ध हैं, जैसे अश्व के समान व्याप्तिशील वेग वाली किरणें सूर्य से संबद्ध हैं और जैसे अन्नादि का निमित्त जल विद्युदग्नि से संबद्ध है, उसी प्रकार स्त्री-पुरुष परस्पर अच्छे व्रतों से संबद्ध हैं। वे सदा दौहार्द भाव को छोड़कर सुखों को बढ़ाएँ ।। १२ । ७४ ।।