Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 73

117 Mantra
12/73
Devata- अघ्न्या देवताः Rishi- कुमारहारित ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
विमु॑च्यध्वमघ्न्या देवयाना॒ऽअग॑न्म॒ तम॑सस्पा॒रम॒स्य। ज्योति॑रापाम॥७३॥

वि। मु॒च्य॒ध्व॒म्। अ॒घ्न्याः॒। दे॒व॒या॒ना॒ इति॑ देवऽयानाः। अग॑न्म। तम॑सः। पा॒रम्। अ॒स्य। ज्योतिः॑। आ॒पा॒म॒ ॥७३ ॥

Mantra without Swara
विमुच्यध्वमघ्न्या देवयाना अगन्म तमसस्पारमस्य ज्योतिरापाम ॥

वि। मुच्यध्वम्। अघ्न्याः। देवयाना इति देवऽयानाः। अगन्म। तमसः। पारम्। अस्य। ज्योतिः। आपाम॥७३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो! जैसे तुम (अघ्न्या) हनन के अयोग्य (देवयानाः) दिव्य भोगों को प्राप्त कराने वाली गौओं को प्राप्त करके, सुसंस्कृत अन्नों को खाकर रोगों से (विमुच्यध्वम्) विमुक्त रहते हो वैसे हम भी रोग-विमुक्त रहें।
जैसे तुम (तमसः) अन्धकार के (पारम्) पार को प्राप्त करते हो वैसे हम भी (अगन्म) प्राप्त करें। जैसे तुम (अस्य) इस सूर्य के (ज्योतिः) प्रकाश को प्राप्त करते हो वैसे हम भी (आपाम) प्राप्त करें ।। १२ । ७३ ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलंकार है। मनुष्य-गौ आदि पशुओं की स्वयं कभी हत्या न करें, और न हत्या करावें।
जैसे सूर्योदय से रात्रि निवृत्त हो जाती है, वैसे वैद्यक शास्त्र की रीति से पथ्य अन्नों का सेवन करके रोग-निवृत्त रहें ।। १२ । ७३ ।।
Subject
मनुष्यों को गौ आदि पशुओं को बढ़ा उन से दूध, घी आदि की वृद्धि कर आनन्द में रहना चाहिए, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
१. गायादि के पालन से रोगमुक्ति-- गायादि दुधारु पशु देवयाना:--दिव्य भोगों को प्राप्त कराने वाले होते हैं। अतः उनका पालन अवश्य करना चाहिये। घी दूधादि से अन्नों को सुसंस्कृत करके भोजन करने से रोगों से मुक्ति होती है। जैसे सूर्य के प्रकाश से अन्धकार दूर हो जाता है, वैसे ही वैद्यक शास्त्रों के अनुसार घृतादि से संस्कृत अन्नों के खाने से रोगों से निवृत्ति होती है ।
२. अलङ्कार--इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । उपमा यह है--जैसे सूर्य अन्धकार को दूर करता है वैसे ही संस्कृत अन्न खाने से रोगों की निवृत्ति होती है ।। १२ । ७३ ।।