Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 68

117 Mantra
12/68
Devata- कृषीवलाः कवयो वा देवताः Rishi- विश्वावसुर्ऋषिः Chhand- विराडार्षी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒नक्त॒ सीरा॒ वि यु॒गा त॑नुध्वं कृ॒ते योनौ॑ वपते॒ह बीज॑म्। गि॒रा च॑ श्रु॒ष्टिः सभ॑रा॒ अस॑न्नो॒ नेदी॑य॒ऽइत्सृ॒ण्यः प॒क्वमेया॑त्॥६८॥

यु॒नक्त॑। सीरा॑। वि। यु॒गा। त॒नु॒ध्व॒म्। कृ॒ते। योनौ॑। व॒प॒त॒। इ॒ह। बीज॑म्। गि॒रा। च॒। श्रु॒ष्टिः। सभ॑रा॒ इति॒ सऽभ॑राः। अस॑त्। नः॒। नेदी॑यः। इत्। सृ॒ण्यः᳖। प॒क्वम्। आ। इ॒या॒त् ॥६८ ॥

Mantra without Swara
युनक्त सीरा वि युगा तनुध्वङ्कृते योनौ वपतेह बीजम् । गिरा च श्रुष्टिः सभराऽअसन्नो नेदीयऽइत्सृण्यः पक्वमेयात् ॥

युनक्त। सीरा। वि। युगा। तनुध्वम्। कृते। योनौ। वपत। इह। बीजम्। गिरा। च। श्रुष्टिः। सभरा इति सऽभराः। असत्। नः। नेदीयः। इत्। सृण्यः। पक्वम्। आ। इयात्॥६८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (इह) इस बुद्धि में साधनों को (वि+तनुध्वम्) विस्तृत करो, (सीराः) नाड़ियों को एवं (युगा) योगसाधनों को (युनक्त) युक्त करो (कृते) योग-अङ्गों से निष्पन्न अन्तःकरण में (योनौ) योग के क्षेत्र में (बीजम्) सिद्धि के मूल को (वपत) बोओ। (गिरा) योग-कर्म में उपयोगी सुशिक्षित वाणी से (च) और सुविचार से (सभराः) समान रूप से सबका धारण-पोषण करने वाले (श्रुष्टिः) शीघ्र बनो। और जो (सृण्यः) योग को प्राप्त कराने वाले साधन हैं, उनसे जो (नेदीय:) अत्यन्त निकट (अस्तु) हो, (पक्वम्) परिपक्व हो, उसे ( इद्) ही (नः) हमें (आ+इयात्) प्राप्त करो ।।
Essence
हे मनुष्यो! तुम विद्वानों और किसानों से कृषि और योग-कर्म की शिक्षा को प्राप्त करके, अनेक साधनों को सिद्ध करके, कृषि और योग को सिद्ध करो।
अतः जो-जो पाक बने उस-उस को ग्रहण करके खाओ वा खिलाओ ।। १२ । ६८ ।।
Subject
खेती और योग-विद्या का फिर उपदेश किया है ।।
Refrences
'श्रुष्टिः' यहाँ श्रुष्टि शब्द क्षिप्रवाचक है। निरु० (६।१२) में इसका निर्वचन यह किया है--जो शीघ्र व्याप्त करे उसे श्रुष्टि कहते हैं।
Commentary Essence
कृषि विद्या का उपदेश-–सब मनुष्यों को चाहिये कि वे नये-नये कृषि के यन्त्रों का निर्माण करके भूमि की उपज बढ़ाते रहें। क्योंकि हलादि उत्तम साधनों की सहायता से ही उत्तम खेती हो सकती है। उपज बढ़ाने के लिए उत्तम बीज बोना चाहिये। बीजों की जो विभिन्न जातियाँ हैं उनका विकास करते रहें। जो कृषिविद्या में सुशिक्षित हों, अथवा जो कृषि-कर्म में निपुण हों। वे दोनों ही समान विचारों वाले होकर कृषि-कर्म को नित्य बढ़ायें और धान्यादि से सुखों को प्राप्त करें ।। १२ । ६८ ।।
Elsewhere Availablity
हे उपासक लोगो! तुम योगाभ्यास और परमात्मा के योग से नाड़ियों में ध्यान करके परमानन्द को (वितनुध्वम्) विस्तार करो, इस प्रकार करने से (कृते योनौ) योनि अर्थात् अपने अन्तःकरण को शुद्ध और परमानन्दस्वरूप परमेश्वर में स्थिर करके उसमें उपासना विधान से विज्ञानरूप (बीजम्) बीज को (वपत) अच्छी प्रकार से बोओ तथा (गिरा च) पूर्वोक्त प्रकार से वेदवाणी करके परमात्मा में (युनक्त) युक्त होकर उसकी स्तुति, प्रार्थना और उपासना में प्रवृत्ति करो तथा (श्रुष्टिः) तुम लोग ऐसी इच्छा करो कि हम उपासना-योग के फल को प्राप्त होवें और (नो नेदीयः) हमको ईश्वर के अनुग्रह से वह फल (असत्) शीघ्र ही प्राप्त हो, कैसा वह फल है कि (पक्वम्) जो परिपक्व शुद्ध परम आनन्द से भरा हुआ और मोक्ष सुख को प्राप्त करने वाला है (इत्सृण्यः) अर्थात् वह उपासना योगवृत्ति कैसी है कि सब क्लेशों को नाश करने वाली और (सभराः) सब शान्ति आदि गुणों से पूर्ण है। उन उपासना योगवृत्तियों से परमात्मा के योग को अपने आत्मा में प्रकाशित करो ।। १२ । ६८ ।।