Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 63

117 Mantra
12/63
Devata- निर्ऋतिर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नमः॒ सु ते॑ निर्ऋते तिग्मतेजोऽय॒स्मयं॒ विचृ॑ता ब॒न्धमे॒तम्। य॒मेन॒ त्वं य॒म्या सं॑विदा॒नोत्त॒मे नाके॒ऽअधि॑ रोहयैनम्॥६३॥

नमः। सु। ते॒। नि॒र्ऋ॒त॒ इति॑ निःऽऋते। ति॒ग्म॒ते॒ज॒ इति॑ तिग्मऽतेजः। अ॒य॒स्मय॑म्। वि। चृ॒त॒। ब॒न्धम्। ए॒तम्। य॒मेन॑। त्वम्। य॒म्या। सं॒वि॒दा॒नेति॑ सम्ऽविदा॒ना। उ॒त्त॒म इत्यु॑त्ऽत॒मे। नाके॑। अधि॑। रो॒ह॒य॒। ए॒न॒म् ॥६३ ॥

Mantra without Swara
नमः सु ते निरृते तिग्मतेजो यस्मयँ वि चृता बन्धमेतम् । यमेन त्वँयम्या सँविदानोत्तमे नाके अधि रोहयैनम् ॥

नमः। सु। ते। निर्ऋत इति निःऽऋते। तिग्मतेज इति तिग्मऽतेजः। अयस्मयम्। वि। चृत। बन्धम्। एतम्। यमेन। त्वम्। यम्या। संविदानेति सम्ऽविदाना। उत्तम इत्युत्ऽतमे। नाके। अधि। रोहय। एनम्॥६३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (निर्ऋते) नितान्त सत्य से युक्त स्त्री! (ते) तेरा (तिग्मतेजः) तीव्र तेजों का हेतु (अयस्मयम्) सुवर्ण आदि का कारण (नमः) अन्न आदि है, सो तू (एतम्) इस (बन्धम्) बन्धन को (सु + वि + चृत) उत्तम रीति से खोल। और (यमेन) न्यायाधीश पुरुष तथा (यम्या) न्यायकर्त्री स्त्री के साथ (संविदाना) सत्य प्रतिज्ञा वाली होकर (एनम्) इस पति को (उत्तमे) श्रेष्ठ (नाके) भोग करने योग्य आनन्द में (अधि + रोह) आरूढ कर ॥
Essence
हे स्त्रियो ! तुम, जैसे यह पृथिवी तेज, सुवर्ण और अन्न आदि से सम्बन्धित है, वैसी ही बनो। तुम्हारे पति न्यायाधीश होकर, दोषी और निर्दोषों का सत्य-न्याय से विवेचन करके, दोषियों को दण्ड देते हैं और निर्दोषों का सत्कार करते हैं, और तुम्हें उत्तम आनन्द प्रदान करते हैं, वैसी तुम भी बनो ।। १२ । ६३ ।।
Subject
फिर ये स्त्रियाँ कैसी हों, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
'अयस्मयम्' यहां 'अयस्' शब्द हिरण्यवाची है और यह शब्द निघं० (१।२) में हिरण्यवाचियों में पढ़ा है। 'विचृता' यहाँ द्वयचोऽतस्तिङ:' इस सूत्र से दीर्घ हुआ है ।
Commentary Essence
गृहस्थ-स्त्रियों का धर्म--गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके स्त्रियाँ भूमि की तरह सदा सहनशील, सत्याचरण वाली होकर रहें, जिससे उनका यश सर्वत्र बढ़ता रहे। न्यायाधीश के समान सत्यासत्य के विवेक में कुशल स्त्री पुरुषों की संगति से श्रेष्ठ ज्ञान का अर्जन सदा करे और दुःखप्रद कारणों से पृथक् रहकर अपने सदाचरण से पुरुष को भी उत्तम सुख देने वाले मार्ग पर चलाये।