Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 61

117 Mantra
12/61
Devata- पत्नी देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- आर्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा॒तेव॑ पुत्रं पृ॑थि॒वी पु॑री॒ष्यम॒ग्नि स्वे योना॑वभारु॒खा। तां विश्वै॑र्दे॒वैर्ऋ॒तुभिः॑ संविदा॒नः प्र॒जाप॑तिर्वि॒श्वक॑र्म्मा॒ वि मु॑ञ्चतु॥६१॥

मा॒तेवेति॑ मा॒ताऽइ॑व। पु॒त्रम्। पृ॒थि॒वी। पु॒री॒ष्य᳖म्। अ॒ग्निम्। स्वे। यौनौ॑। अ॒भाः॒। उ॒खा। ताम्। विश्वैः॑। दे॒वैः॒। ऋ॒तुभि॒रित्यृ॒तुऽभिः॑। सं॒वि॒दा॒न इति॑ सम्ऽविदा॒नः। प्र॒जाप॑ति॒रिति॑ प्र॒जाऽप॑तिः। वि॒श्वक॒र्म्मेति॑ वि॒श्वऽक॑र्मा। वि। मु॒ञ्च॒तु॒ ॥६१ ॥

Mantra without Swara
मातेव पुत्रम्पृथिवी पुरीष्यमग्निँ स्वे योनावभारुखा । ता विश्वैर्देवैरृतुभिः सँविदानः प्रजापतिर्विश्वकर्मा वि मुञ्चतु ॥

मातेवेति माताऽइव। पुत्रम्। पृथिवी। पुरीष्यम्। अग्निम्। स्वे। यौनौ। अभाः। उखा। ताम्। विश्वैः। देवैः। ऋतुभिरित्यृतुऽभिः। संविदान इति सम्ऽविदानः। प्रजापतिरिति प्रजाऽपतिः। विश्वकर्म्मेति विश्वऽकर्मा। वि। मुञ्चतु॥६१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
जो (उखा) जानने के योग्य [पृथिवी] भूमि के समान वर्तमान विदुषी स्त्री (स्वे) अपने (योनौ) गर्भाशय में (पुरीष्यम्) पुष्टिकारक गुणों से युक्त, (अग्निम्) विद्युत् के समान सुप्रकाश वाले पुत्र का माता के समान (अभाः) पोषण वा धारण करती है, उस स्त्री को (संविदानः) उत्तम रीति से उपदेश करता हुआ (विश्वकर्मा) अखिल उत्तम कर्मों वाला, (प्रजापतिः) परमेश्वर (विश्वैः) सब (देवैः) दिव्य-गुणों से युक्त (ऋतुभिः) वसन्त आदि ऋतुओं के द्वारा सदा दुःख से (वि+मुञ्चतु) पृथक् रखें ।। १२ । ६१।।
Essence
इस मन्त्र में उपमा अलंकार है । जैसे जननी सन्तानों को उत्पन्न करके पालन करती है, वैसे ही पृथिवी कारणस्थ विद्युत् को प्रकट करके उसकी रक्षा करती है ।
जैसे परमेश्वर यथार्थ रूप से पृथिवी आदि के गुणों को जानता है, प्रत्येक के नियत समय पर ऋतु आदि और पृथिवी आदिकों को धारण करके अपनी-अपनी नियत परिधि में चलाकर, प्रलय समय में भेदन करता है, वैसे ही विद्वान् लोग यथाबुद्धि इन्हें जानकर कार्य-सिद्धि के लिए प्रयत्न करें।
Subject
माता किसके तुल्य सन्तानों को पालती है, यह उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
१. माता का कर्त्तव्य--सन्तान के पालन करने में माता का स्थान पृथिवी के समान होता है। जैसे सर्वज्ञ परमेश्वर इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना अपने अनन्त सामर्थ्य से करता है और दिव्यगुणों से युक्त ऋतुओं के द्वारा पृथिवी से उत्पन्न होने वाला धान्य और फलादि के द्वारा सब प्राणियों का पालन करता है और नाना प्रकार के रोगों से मुक्त रखता है, वैसे ही विदुषी माता बालक को गर्भाशय में सुरक्षित रक्खे और पुष्टिकारक गुणों से बालक को विद्युत् की तरह तेजस्वी बनायें । और अच्छी-अच्छी शिक्षाएँ देकर बालक को सुशिक्षित करे ।
२. अलङ्कार— इस मन्त्र में उपमा अलङ्कार है । उपमा यह है कि जैसे माता सन्तान को उत्पन्न कर उसका पालन करती है वैसे ही परमात्मा पृथिवी आदि से औषधियों को पैदा करके प्राणियों को पालता है ।। १२ । ६१ ।।