Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 6

117 Mantra
12/6
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वत्सप्रीर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अक्र॑न्दद॒ग्नि स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः क्षामा॒ रेरि॑हद् वी॒रुधः॑ सम॒ञ्जन्। स॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो वि हीमि॒द्धोऽअख्य॒दा रोद॑सी भा॒नुना॑ भात्य॒न्तः॥६॥

अक्र॑न्दत्। अ॒ग्निः। स्त॒नय॑न्नि॒वेति॑ स्त॒नय॑न्ऽइव। द्यौः। क्षामा॑। रेरि॑हत्। वी॒रुधः॑। सम॒ञ्जन्निति॑ सम्ऽअ॒ञ्जन्। स॒द्यः। ज॒ज्ञा॒नः। वि। हि। ई॒म्। इ॒द्धः। अख्य॑त्। आ। रोद॑सीऽइति॒ रोद॑सी। भा॒नुना॑। भा॒ति॒। अ॒न्तरित्य॒न्तः ॥६ ॥

Mantra without Swara
अक्रन्ददग्नि स्तनयन्निव द्यौः क्षामा रेरिहद्वीरुधः समञ्जन् । सद्यो जज्ञानो वि हीमिद्धोऽअख्यदा रोदसी भानुना भात्यन्तः ॥

अक्रन्दत्। अग्निः। स्तनयन्निवेति स्तनयन्ऽइव। द्यौः। क्षामा। रेरिहत्। वीरुधः। समञ्जन्निति सम्ऽअञ्जन्। सद्यः। जज्ञानः। वि। हि। ईम्। इद्धः। अख्यत्। आ। रोदसीऽइति रोदसी। भानुना। भाति। अन्तरित्यन्तः॥६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! जो सभापति (सद्यः) उसी दिन शीघ्र (जज्ञानः) प्रसिद्ध (द्यौः) सूर्य प्रकाश, रूप (अग्निः) विद्युत् (स्तनयन्निव) जैसे दिव्य शब्द करती हुई शत्रुओं को (आ +अक्रन्दत्) प्राप्त होती है, जैसे (क्षामा) पृथिवी (वीरुधः) वृक्षों को प्राप्त होती है वैसे प्रजा को सुखदायक (रेरिहत्) फल प्रदान करता है ।
जैसे सूर्य ( इद्धः) प्रदीप्त होकर (समञ्जन् ) प्रकाश करता हुआ (रोदसी) द्युलोक, और पृथिवी को [ईम्] सब ओर से (वि + अख्यत्) प्रकाशित करता है (भानुना) अपनी दीप्ति से (अन्तः) मध्य में वर्त्तमान होकर (आ+भाति) सब ओर प्रकाश करता है, वैसे जो सभापति शुभ गुण, कर्म, स्वभाव से प्रकाशित है उसे (हि) ही राजकार्यों में प्रयुक्त करो ।। १२ । ६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार है ।। हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य सब लोकों के मध्य में स्थित होकर सबका प्रकाशन और आकर्षण करता है, जैसे पृथिवी बहुत फल प्रदान करने वाली है, ऐसे गुणों वाले पुरुष का राज्य कार्यों में ठीक उपयोग करें ।। १२ । ६ ।।
Subject
राजधर्म का फिर उपदेश किया है ।।
Refrences
'क्षामा' यह शब्द निघण्टु में (१।१) पृथिवी नामों में पढ़ा है । और इसमें 'अन्येषामपि' इस सूत्र से उपधा को दीर्घ हुआ है ।
Commentary Essence
१. राज-धर्म--जैसे विद्युत् गर्जना करके मेघों को छिन्न-भिन्न कर देता है वैसे ही राजा सदा शत्रुओं का विनाश करने वाला हो। और जैसे पृथिवी सभी प्राणियों के हितार्थ ओषधियों और विविध फल वाले वृक्षों को पैदा करती है वैसे ही राजा को योग्य है कि वह अपने राज्य में तरह-तरह के उद्योगों की स्थापना कराए और प्रजा के सुख की सदा वृद्धि करे। और जैसे सूर्य स्वयं प्रकाशमान होकर सबको प्रकाशित करता है वैसे ही स्वयं शुभ-गुण-कर्म-स्वभाव से युक्त होकर सदा प्रसिद्धि को प्राप्त करे। क्योंकि अयोग्य राजा के होने से कभी भी सुख की वृद्धि नहीं हो सकती ।
२. अलङ्कार -- इस मन्त्र में 'इव' पद के प्रयोग होने से उपमा अलङ्कार है और इवादि पदों का लोप होने से भी वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । उपमा यह है जैसे सूर्य सब का प्रकाशक है और पृथिवी बहुविध फलों को देने वाली है वैसे ही राजा भी होना चाहिये ।। १२ । ६ ॥