Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 59

117 Mantra
12/59
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अग्ने॒ त्वं पु॑री॒ष्यो रयि॒मान् पु॑ष्टि॒माँ२ऽअ॑सि। शि॒वाः कृ॒त्वा दिशः॒ सर्वाः॒ स्वं योनि॑मि॒हास॑दः॥५९॥

अग्ने॒। त्वम्। पु॑री॒ष्यः᳖। र॒यि॒मानिति॑ रयि॒ऽमान्। पु॒ष्टि॒मानिति॑ पुष्टि॒ऽमान्। अ॒सि॒। शि॒वाः। कृ॒त्वा। दिशः॑। सर्वाः॑। त्वम्। योनि॑म्। इ॒ह। आ। अ॒स॒दः॒ ॥५१ ॥

Mantra without Swara
अग्ने त्वं पुरीष्यो रयिमान्पुष्टिमाँ असि । शिवाः कृत्वा दिशः सर्वाः योनिमिहासदः॥

अग्ने। त्वम्। पुरीष्यः। रयिमानिति रयिऽमान्। पुष्टिमानिति पुष्टिऽमान्। असि। शिवाः। कृत्वा। दिशः। सर्वाः। त्वम्। योनिम्। इह। आ। असदः॥५१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) उपदेशक विद्वान् ! क्योंकि आप (इह) इस संसार में (पुरीष्यः) एकमत को पालन करने वालों में वर्तमान, (रयिमान्) विद्या; विज्ञान तथा धन से युक्त और (पुष्टिमान्) प्रशस्त शरीर और आत्मा के बल से युक्त (असि) हो, इसलिए (सर्वाः) सब (दिशः) उपदेश के योग्य प्रजा को (शिवाः) कल्याणकारी उपदेश से युक्त करके (स्वम्) अपने (योनिम्) सुखसाधक तथा दुःख-विच्छेदक उपदेश को (आ+असदः) स्थापित करो ।। १२ । ५९।।
Essence
राजा और प्रजा-जनों को चाहिये कि वे, जो यहाँ जितेन्द्रिय, धार्मिक, परोपकारी विद्वान् हों उन्हें प्रजा में धर्मोपदेश के लिए लगावें।
और उपदेशक प्रयत्न से सबको शिक्षा के द्वारा एक धर्म से युक्त सदा अविरोधी एवं सुखी बनावें ।। १२ । ५९ ।।
Subject
किन को पढ़ाने और उपदेश के लिए नियुक्त करना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है।।
Commentary Essence
अध्यापक की योग्यता-- (१) अग्निः=अध्यापक ज्ञानाग्नि से प्रदीप्त होना चाहिये। (२) पुरीष्यः=निश्चित एक मत वाला हो। जो अनिश्चित ज्ञान वाला हो उसका ज्ञान अपूर्ण होता है। (३) रयिमान्=विद्या तथा सुवर्णादि धन से पूर्ण हो। (४) पुष्टिमान्=प्रशस्त शारीरिक तथा प्रशस्त आत्मिक बल वाला हो। (५) योनिम् शिवाः=सुख-प्रापक कल्याणकारी उपदेश देने वाला हो । स्वयं धार्मिक तथा जितेन्द्रिय होकर दूसरों को अच्छी शिक्षा देने वाला हो ।। १२ । ५ ९।।