Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 58

117 Mantra
12/58
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मधुच्छन्दा ऋषिः Chhand- भुरिगुपरिष्टाद् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
सं वां॒ मना॑सि॒ सं व्र॒ता समु॑ चि॒त्तान्याक॑रम्। अग्ने॑ पुरीष्याधि॒पा भ॑व॒ त्वं न॒ इष॒मूर्जं॒ यज॑मानाय धेहि॥५८॥

सम्। वा॒म्। मना॑सि। सम्। व्र॒ता। सम्। ऊँ॒ इत्यूँ॑। चि॒त्तानि॑। आ। अ॒क॒र॒म्। अग्ने॑। पु॒री॒ष्य॒। अ॒धि॒पा इत्य॑धि॒ऽपाः। भ॒व॒। त्वम्। नः॒। इष॑म्। ऊर्ज॑म्। यज॑मानाय। धे॒हि॒ ॥५८ ॥

Mantra without Swara
सँवाम्मनाँसि सँव्रता समु चित्तान्याकरम् । अग्ने पुरीष्याधिपा भव त्वन्न इषमूर्जँयजमानाय धेहि ॥

सम्। वाम्। मनासि। सम्। व्रता। सम्। ऊँ इत्यूँ। चित्तानि। आ। अकरम्। अग्ने। पुरीष्य। अधिपा इत्यधिऽपाः। भव। त्वम्। नः। इषम्। ऊर्जम्। यजमानाय। धेहि॥५८॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे स्त्री-पुरुषो ! जैसे मैं आचार्य (वाम्) तुम दोनों के (संमनांसि) एक धर्म में अर्थात् सम्मिलित संकल्प-विकल्प आदि अन्तःकरण की वृत्तियों को, (संव्रता) सत्यभाषण आदि व्रतों को, [उ] और (संचित्तानि) उपदिष्ट धर्मयुक्त कर्मों को (आ+अकरम्) सब ओर से सिद्ध करता हूँ, वैसे तुम दोनों मेरा प्रियाचरण करो ।
हे (पुरीष्य) पालक-व्यवहारों में वर्तमान (अग्ने) उपदेशक आचार्य! आप (नः) हमारे (अधिपाः) अत्यन्त पालक (भव) बनो। और (यजमानाय) धर्म से संगतिशील पुरुष के लिए (इषम्) अन्न आदि तथा (ऊर्जम्) शरीर आत्मा के बल को (हि) धारण करो ।। १२ । ५८ ।।
Essence
उपदेशक लोग जितना हो सके, उतना सबका एक धर्म, एक कर्म, एक निष्ठा एवं समान सुख-दुःख होवे वैसी शिक्षा करें। सब स्त्री-पुरुष आप्त विद्वान् उपदेशक एवं अध्यापक की ही सेवा करें, और वे इनके ऐश्वर्य तथा पराक्रम की वृद्धि करें।
क्योंकि एक धर्म आदि के बिना आत्माओं में मित्रता उत्पन्न नहीं होती, और इसके बिना निरन्तर सुख भी नहीं हो सकता ।। १२ । ५८ ।।
Subject
अध्यापक और उपदेशक लोगों को चाहिए कि जितना सामर्थ्य हो उतना ही वेदों का अध्यापन और उपदेश करें, यह उपदेश किया है।।
Commentary Essence
उपदेशक का कर्त्तव्य--उपदेशक अथवा आचार्य सभी स्त्री-पुरुषों को वेदोपदेश करके उनका मार्ग-दर्शन करते रहें। गृहस्थ में स्त्री-पुरुष समान संकल्प वाले होकर एक-दूसरे का सदा प्रियाचरण किया करें। सत्यभाषणादि व्रतों को धारण करके सब कार्यों को सिद्ध करें। इस प्रकार की शिक्षाओं से उपदेशक सदा सब मनुष्यों का अत्यन्त पालक होकर विद्वानों का सत्कार करने वाले यजमान को अन्नादि ऐश्वर्य को बढ़ाकर आत्मा तथा शरीर की सब शक्तियों से युक्त करें ।। २ । ५८ ।।