Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 51

117 Mantra
12/51
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इडा॑मग्ने पुरु॒दꣳस॑ꣳस॒निं गोः श॑श्वत्त॒मꣳ हव॑मानाय साध। स्यान्नः॑ सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावाऽग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे॥५१॥

इडा॑म्। अ॒ग्ने॒। पु॒रु॒दꣳस॒मिति॑ पुरु॒ऽदꣳस॑म्। स॒निम्। गोः। श॒श्व॒त्त॒ममिति॑ शश्वत्ऽत॒मम्। हव॑मानाय। सा॒ध॒। स्यात्। नः॒। सु॒नुः। तन॑यः। वि॒जावेति॑ वि॒जाऽवा॑। अग्ने॑। सा। ते॒। सु॒म॒तिरिति॑ सुऽम॒तिः। भू॒तु॒। अ॒स्मेऽइत्य॒स्मे ॥५१ ॥

Mantra without Swara
इडामग्ने पुरुदँसँ सनिङ्गोः शश्वत्तमँहवमानाय साध । स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे ॥

इडाम्। अग्ने। पुरुदꣳसमिति पुरुऽदꣳसम्। सनिम्। गोः। शश्वत्तममिति शश्वत्ऽतमम्। हवमानाय। साध। स्यात्। नः। सुनुः। तनयः। विजावेति विजाऽवा। अग्ने। सा। ते। सुमतिरिति सुऽमतिः। भूतु। अस्मेऽइत्यस्मे॥५१॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) अध्यापक ! (ते) आपकी वह (सुमतिः) श्रेष्ठ बुद्धि (अस्मे ) हमारी (भूतु) होवे, जिससे (ते) आापका और (नः) हमारा जो (विजावा) विविध ऐश्वर्य को पैदा करने वाला [सूनुः] उत्पन्न (तनयः) पुत्र (स्यात्) होवे, उस सुमति से (हवमानाय) विद्या की स्पर्द्धा करने वाले उस पुत्र के लिए (इडाम्) स्तुति योग्य वाणी को तथा (शश्वत्तमम्) अत्यन्त अनादि रूप वेद-ज्ञान को और (पुरुदंसम्) नाना कर्मों के हेतु (सनिम) विवेक को (साध) सिद्ध कीजिये।
हे (अग्ने) विद्वान्! हम भी उसे सिद्ध करें।। १२ । ५१ ।।
Essence
माता, पिता और आचार्य सावधानता से, गर्भाधान आदि संस्कार की रीति से उत्तम सन्तानों को उत्पन्न करके—
वेद, ईश्वर और विद्या से युक्त बुद्धि को उत्पन्न करें ।
क्योंकि अपत्य-सुख का खजाना रूप ऐसा दूसरा धर्म नहीं है, ऐसा निश्चय करें ।।
Subject
मनुष्य गर्भाधानादि संस्कारों से बालकों का संस्कार करें, इस विषय का उपदेश किया है।।
Refrences
'साध' इसमें 'व्यत्ययो बहुलम्' इस सूत्र से व्यत्यय से शप् प्रत्यय हुआ है। इसी प्रकार 'भूतु' यहाँ शप् प्रत्यय का लुक् और 'भूसुवोस्तिङि' इस सूत्र से गुण का अभाव हुआ है ।
Commentary Essence
गुरुजनों का कर्त्तव्य--आचार्य को योग्य है कि वह पुत्र तुल्य शिष्यों को मेधाबुद्धि से सम्पन्न करे। जिससे विद्या-प्राप्ति में स्पर्धा करते हुए शिष्य स्तुति के योग्य, अनादि वेदवाणी को हृदयंगम करने में अबाध रूप से प्रवृत्त रहें। 'विजावा' अर्थात् विविध ऐश्वर्यों के प्राप्त करने वाले ज्ञानों को सिखावें। उनमें ऐसी विवेक-बुद्धि पैदा करें, जिससे वे अनेक प्रकार की समस्याओं को स्वयं ही समाहित कर लेवें। ऐसे ही माता-पिता भी सन्तान को योग्य बनायें ।। १२ । ५१ ।।