Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 50

117 Mantra
12/50
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विश्वामित्र ऋषिः Chhand- आर्ची पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
पु॒री॒ष्यासोऽअ॒ग्नयः॑ प्राव॒णेभिः॑ स॒जोष॑सः। जु॒षन्तां॑ य॒ज्ञम॒द्रुहो॑ऽनमी॒वाऽइषो॑ म॒हीः॥५०॥

पु॒री॒ष्या᳖सः। अ॒ग्नयः॑। प्रा॒व॒णेभिः॑। प्र॒व॒णेभि॒रिति॑ प्रऽव॒णेभिः॑। स॒जोष॑स॒ इति॑ स॒ऽजोष॑सः। जु॒षन्ता॑म्। य॒ज्ञम्। अ॒द्रुहः॑। अ॒न॒मी॒वाः। इषः॑। म॒हीः ॥५० ॥

Mantra without Swara
पुरीष्यासोऽअग्नयः प्रावणेभिः सजोषसः । जुषन्ताँयज्ञमद्रुहो नमीवा इषोऽमहीः ॥

पुरीष्यासः। अग्नयः। प्रावणेभिः। प्रवणेभिरिति प्रऽवणेभिः। सजोषस इति सऽजोषसः। जुषन्ताम्। यज्ञम्। अद्रुहः। अनमीवाः। इषः। महीः॥५०॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
सब मनुष्य (प्रावणेभिः) नाना विज्ञानों से युक्त होकर (अनमीवाः) रोग-रहित, (अद्रुहः) द्रोह-रहित, (सजोषसः) समान सेवा और प्रीति वाले, (पुरीष्यासः) पूर्ण गुण-कर्मों में वर्तमान (अग्नयः) अग्नि के समान विद्वानों के तुल्य होकर (यज्ञम्), विद्या, विज्ञान, दान, ग्रहण रूप यज्ञ का तथा (मही) महान् (इषः) इच्छाओं का (जुषन्ताम् ) सेवन करें ।। १२ । ५० ।।
Essence
इस मन्त्र में वाचक-लुप्तोपमा अलङ्कार है । जैसे--विद्युत् अविरुद्ध=अनुकूल होकर सत्ता-सामान्य से सब पदार्थों का सेवन करती है, वैसे ही रोग, द्रोह आदि दोषों से रहित विद्वान् मनुष्य परस्पर प्रीतिमान् होकर विज्ञान की वृद्धि करने वाले यज्ञ को फैलाकर महान् सुखों का सदा भोग करें ।। १२ । ५० ।।
Subject
मनुष्यों को द्वेषादिक छोड़ के आनन्द में रहना चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Refrences
'प्रावणेभिः ' यहाँ 'अन्येषामपि दृश्यते' सूत्र से पूर्वपद को दीर्घ हुआ है।
Commentary Essence
मनुष्यों का पारस्परिक व्यवहार--सब मनुष्यों को योग्य है कि वे नाना प्रकार के विज्ञानों को सीखें, रोगरहित रहें, किसी के साथ द्रोहादि न रखकर समान सेवा तथा समान प्रीति वाले हों। सभी श्रेष्ठ गुणों से पुरीष्यासः=पूर्ण होकर ज्ञानाग्नि से प्रदीप्त विद्वानों के समान यज्ञविद्या को सीखकर सब इच्छाओं को प्राप्त करें ।। १२ । ५० ।।