Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 5

117 Mantra
12/5
Devata- विष्णुर्देवता Rishi- श्यावाश्व ऋषिः Chhand- भुरिगुत्कृतिः Swara- षड्जः
Mantra with Swara
विष्णोः॒ क्रमो॑ऽसि सपत्न॒हा गा॑य॒त्रं छन्द॒ऽआरो॑ह पृथि॒वीमनु॒ विक्र॑मस्व॒ विष्णोः॒ क्रमो॑ऽस्यभिमाति॒हा त्रैष्टु॑भं॒ छन्द॒ऽआरो॑हा॒न्तरि॑क्ष॒मनु॒ विक्र॑मस्व॒ विष्णोः॒ क्रमो॑ऽस्यरातीय॒तो ह॒न्ता जाग॑तं॒ छन्द॒ऽआरो॑ह॒ दिव॒मनु॒ विक्र॑मस्व॒ विष्णोः॒ क्रमो॑ऽसि शत्रूय॒तो ह॒न्तानु॑ष्टुभं॒ छन्द॒ऽआरो॑ह॒ दिशोऽनु॒ विक्र॑मस्व॥५॥

विष्णोः॑। क्रमः॑। अ॒सि॒। स॒प॒त्न॒हेति॑ सपत्न॒ऽहा। गा॒य॒त्रम्। छन्दः॑। आ। रो॒ह॒। पृ॒थि॒वीम्। अनु॑। वि। क्र॒म॒स्व॒। विष्णोः॑। क्रमः॑। अ॒सि॒। अ॒भि॒मा॒ति॒हेत्य॑भिमाति॒ऽहा। त्रैष्टु॑भम्। त्रैस्तु॑भ॒मिति॒ त्रैऽस्तु॑भम्। छन्दः॑। आ। रो॒ह॒। अ॒न्तरि॑क्षम्। अनु॑। वि। क्र॒म॒स्व॒। विष्णोः॑। क्रमः॑। अ॒सि॒। अ॒रा॒ती॒य॒तः। अ॒रा॒ति॒य॒त इत्य॑रातिऽय॒तः। ह॒न्ता। जाग॑तम्। छन्दः॑। आ। रो॒ह॒। दिव॑म्। अनु॑। वि। क्र॒म॒स्व॒। विष्णोः॑। क्रमः॑। अ॒सि॒। श॒त्रू॒य॒तः। श॒त्रु॒य॒त इति॑ शत्रुऽय॒तः। ह॒न्ता। आनु॑ष्टुभम्। आनु॑स्तुभ॒मित्यानु॑ऽ स्तुभम्। छन्दः॑। आ। रो॒ह॒। दिशः॑। अनु॑। वि। क्र॒म॒स्व॒ ॥५ ॥

Mantra without Swara
विष्णोः क्रमो सि सपत्नहा गायत्रञ्छन्दऽआ रोह पृथिवीमनु विक्रमस्व । विष्णोः क्रमो स्यभिमातिहा त्रैष्टुभञ्छन्दऽआरोहान्तरिक्षमनु विक्रमस्व विष्णोः क्रमो स्यरातीयतो हन्ता जागतञ्छन्दऽआ रोह दिवमनु विक्रमस्व विष्णोः क्रमो सि शत्रूयतो हन्तानुष्टुभञ्छन्दऽआ रोह दिशोनु विक्रमस्व ॥

विष्णोः। क्रमः। असि। सपत्नहेति सपत्नऽहा। गायत्रम्। छन्दः। आ। रोह। पृथिवीम्। अनु। वि। क्रमस्व। विष्णोः। क्रमः। असि। अभिमातिहेत्यभिमातिऽहा। त्रैष्टुभम्। त्रैस्तुभमिति त्रैऽस्तुभम्। छन्दः। आ। रोह। अन्तरिक्षम्। अनु। वि। क्रमस्व। विष्णोः। क्रमः। असि। अरातीयतः। अरातियत इत्यरातिऽयतः। हन्ता। जागतम्। छन्दः। आ। रोह। दिवम्। अनु। वि। क्रमस्व। विष्णोः। क्रमः। असि। शत्रूयतः। शत्रुयत इति शत्रुऽयतः। हन्ता। आनुष्टुभम्। आनुस्तुभमित्यानुऽ स्तुभम्। छन्दः। आ। रोह। दिशः। अनु। वि। क्रमस्व॥५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान् ! क्योंकि आप (विष्णोः) व्यापक जगदीश्वर के (क्रमः) व्यवहार हो, (सपत्नहः) शत्रुओं के घातक (असि) हो, अतः (गायत्रम्) गायत्री-विहित (छन्दः) स्वच्छ वेदार्थ पर (आ+रोह) आरूढ रहो, (पृथिवीम्) भूगर्भविद्या को (अनु+वि+क्रमस्व) व्यवहार में लाओ ।
क्योंकि आप (विष्णोः) व्यापक कारण=प्रकृति के (क्रम) कार्य रूप हो, (अभिमातिहा) अभिमानियों का हनन करने वाले (असि) हो, अतः आप (त्रैष्टुभम्) तीन मुखों से सम्बद्ध (छन्दः) बलदायक वेदार्थ पर (आ+रोह) आरूढ़ रहो (अन्तरिक्षम्) खगोल विद्या को (अनु+वि+क्रमस्व) व्यवहार में लाओ।
क्योंकि आप (विष्णोः) व्याप्तिशील विद्युत् रूप अग्नि के (क्रमः) व्यवहार हो, (अरातीयतः) विद्यादि दान करने के अनिच्छुक पुरुष के (हन्ता) नाशक (असि) हो, अतः (जागतम्) जगत्-ज्ञान के साधन (छन्दः) सृष्टि विद्या के बलकारी वेदार्थ पर (आ+रोह) आरूढ़ रहो, (दिवम्) सूर्य आदि अग्नि विद्या को (अनु+वि+क्रमस्व) व्यवहार में लाओ ।
जो आप (विष्णोः) हिरण्यगर्भ वायु के (क्रमः) व्यवहार हो, (शत्रूयतः) अपने से शत्रुता करने वाले के (हन्ता) नाशक (असि) हो, सो आप (आनुष्टुभम्) अनुकूलता से सुख को बांधने के साधन (छन्दः) आनन्दकारी (छन्दः) वेदार्थ पर (आ+ रोह) आरूढ़ रहो, (दिशः) पूर्व आदि दिशा को (अनु+वि+क्रमस्व) अनुकूल बनाने का प्रयत्न करो ।। १२ । ५ ।
Essence
मनुष्य वेद विद्या से भूगर्भ आदि विद्याओं को निश्चित करके, उन्हें पराक्रम से बढ़ाकर रोग और शत्रुओं का हनन करें ।।
Subject
फिर राजधर्म का उपदेश किया है ।
Commentary Essence
राजा के कर्तव्य--(१) राजा सर्वव्यापक ईश्वर का प्रतिनिधि है, अतः वह शत्रुओं का विनाश सदा करे और वेदादि सत्यशास्त्रों का ज्ञाता होकर अथवा वेदवेत्ताओं का परिपोषक होकर भूगर्भ विद्या को खोजकर सदा व्यवहार में लाये । (२) राजा प्रकृति-विज्ञान को कार्य रूप में लाने वाला होता है अतः प्रकृति-नियमों का अनुसन्धान करा कर खगोलविद्या को व्यवहार में लावे। और सभी प्रकार के सुखों को प्राप्त होवे । (३) राजा सर्वत्र विद्यमान विद्युत् का विज्ञान कराके व्यवहार में लाये। सूर्यादि विद्याओं का ज्ञान भी करे । और जो भी विद्या के जानने में बाधक कारण हों उनको सदा नष्ट करे । (४) राजा को वायु-विज्ञान का भी प्रसार तथा वृद्धि करनी चाहिये । इन विज्ञानों की सहायता से पूर्वादि दिशाओं को सदा अपने अनुकूल बनाता रहे ।। १२ । ५ ।।