Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 46

117 Mantra
12/46
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सोमाहुतिर्ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सं॒ज्ञान॑मसि काम॒ध॑रणं॒ मयि॑ ते काम॒धर॑णं भूयात्। अ॒ग्नेर्भस्मा॑स्य॒ग्नेः पुरी॑षमसि॒ चित॑ स्थ परि॒चित॑ऽऊर्ध्व॒चितः॑ श्रयध्वम्॥४६॥

सं॒ज्ञान॒मिति॑ स॒म्ऽज्ञान॑म्। अ॒सि॒। का॒म॒धर॑ण॒मिति॑ काम॒ऽधर॑णम्। मयि॑। ते॒। का॒म॒धर॑ण॒मिति॑ काम॒ऽधर॑णम्। भू॒या॒त्। अ॒ग्नेः। भस्म॑। अ॒सि॒। अ॒ग्नेः। पुरी॑षम्। अ॒सि॒। चितः॑। स्थ॒। प॒रि॒चित॒ इति॑ परि॒ऽचितः॑। ऊ॒र्ध्व॒चित॒ इत्यू॑र्ध्व॒ऽचितः॑। श्र॒य॒ध्व॒म् ॥४६ ॥

Mantra without Swara
सञ्ज्ञानमसि कामधरणम्मयि ते कामधरणम्भूयात् । अग्नेर्भस्मास्यग्नेः पुरीषमसि चित स्थ परिचितऽऊर्ध्वचितः श्नयध्वम् ॥

संज्ञानमिति सम्ऽज्ञानम्। असि। कामधरणमिति कामऽधरणम्। मयि। ते। कामधरणमिति कामऽधरणम्। भूयात्। अग्नेः। भस्म। असि। अग्नेः। पुरीषम्। असि। चितः। स्थ। परिचित इति परिऽचितः। ऊर्ध्वचित इत्यूर्ध्वऽचितः। श्रयध्वम्॥४६॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वान्! आप जिस (संज्ञानम्) उत्तम विज्ञान को प्राप्त (असि) हो आप (अग्नेः) अग्नि के (भस्म) जिन दोषों को दग्ध करने वाले (असि) हो, (अग्ने) विद्युत् के जिस (पुरीषम्) पूर्ण बल को प्राप्त (असि) हो, उसे मुझे प्राप्त कराओ।
(ते) आपका जो (कामधरणम्) संकल्पों का आधार है, वह (कामधरणम्) संकल्पों का आधार (मयि) मुझ में भी (भूयात्) होवे ।
जैसे आप विद्या आदि शुभ गुणों से (चितः) युक्त हो, (परिचितः) उन्हें सब ओर से संचित करने वाले तथा (ऊर्ध्वचितः) उन्हें उन्नत करने वाले (स्थ) हो, और पुरुषार्थ का (आ+श्रयध्वम् ) सेवन करते हो, वैसे हम भी होवें ।। १२ । ४६ ॥
Essence
जिज्ञासु लोग सदा विद्वानों से विद्याओं को प्रार्थनापूर्वक पूछें कि जितना आपमें पदार्थविज्ञान है वह सब हममें स्थापित करो ।
जितनी हस्त क्रियायें आप जानते हैं, उतनी हमें सिखाओ ।
- जैसे हम आपके आश्रित होवें वैसे ही आप हमारे आश्रित हों ।। १२ । ४६ ।।
Subject
पढ़ने-पढ़ाने वाले क्या करके सुखी हों, इस विषय का उपदेश किया है।।
Commentary Essence
अध्यापक का कर्त्तव्य-- जितना भी उत्तम पदार्थ विज्ञान है वह सब जिज्ञासुओं को सिखाकर अध्यापक का कर्त्तव्य है कि वह उनके दोषों को भी दूर कराये। उसके लिये आवश्यक है कि अध्यापक भी सच्चरित्र तथा सत्य संकल्प वाला हो। सब प्रकार के ज्ञानों से युक्त करना, परिचित कराना तथा उसको बढ़ाना अध्यापक का मुख्य कर्त्तव्य है ।