Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 45

117 Mantra
12/45
Devata- पितरो देवताः Rishi- सोमाहुतिर्ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अपे॑त॒ वीत॒ वि च॑ सर्प॒तातो॒ येऽत्र॒ स्थ पु॑रा॒णा ये च॒ नूत॑नाः। अदा॑द्य॒मोऽव॒सानं॑ पृथि॒व्याऽअक्र॑न्नि॒मं पि॒तरो॑ लो॒कम॑स्मै॥४५॥

अप॑। इ॒त॒। वि। इ॒त॒। वि। च॒। स॒र्प॒त॒। अतः॑। ये। अत्र॑। स्थ। पु॒रा॒णाः। ये। च॒। नूत॑नाः। अदा॑त्। य॒मः। अ॒व॒सान॒मित्य॑व॒ऽसान॑म्। पृ॒थि॒व्याः। अक्र॑न्। इ॒मम्। पि॒तरः॑। लो॒कम्। अ॒स्मै॒ ॥४५ ॥

Mantra without Swara
अपेत वीत वि च सर्पतातो ये त्र स्थ पुराणा ये च नूतनाः । अदाद्यमो वसानम्पृथिव्या अक्रन्निमम्पितरो लोकमस्मै ॥

अप। इत। वि। इत। वि। च। सर्पत। अतः। ये। अत्र। स्थ। पुराणाः। ये। च। नूतनाः। अदात्। यमः। अवसानमित्यवऽसानम्। पृथिव्याः। अक्रन्। इमम्। पितरः। लोकम्। अस्मै॥४५॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे विद्वानो ! (ये) जो (अत्र) इस समय (पृथिव्या) भूमि पर विद्यमान (पुराणा:) पुराने विद्वान् हैं, और (ये च) जो (नूतनाः) नये विद्वान् हैं, (पितरः) पिता, अध्यापक वा परीक्षक (स्थ) हैं, वे (अस्मै) इस सत्यसंकल्प वाले मनुष्य के लिए (इमम्) इस (लोकम्) आर्ष दर्शन को (अक्रन्) प्राप्त करें ।
तुम्हें (यमः) प्राप्त परीक्षक (अवसानम्) अवकाश वा अधिकार (अदात्) प्रदान करे, सो तुम (अतः) इस अधर्म से (अप+इत) दूर रहो, और धर्म को (वि+इत) विविध प्रकार से प्राप्त करो। और (अत्र) इसी समय ही (वि+सर्पत) प्राप्त करो ।। १२ । ४५ ।।
Essence
यही माता, पिता और आचार्य का परम धर्म है कि सन्तानों को विद्या, सुशिक्षा की प्राप्ति कराना।
जो अधर्म से मुक्त और धर्म से युक्त परोपकारी वृद्ध और युवक विद्वान् हैं, वे सदा सत्य उपदेश से अविद्या को हटाकर तथा विद्या को उत्पन्न करके कृतकृत्य होवें ।। १२ । ४५ ।।
Subject
सन्तान और पिता-माता परस्पर किन-किन कर्मों का आचरण करें, यह उपदेश किया है॥
Commentary Essence
सन्तान और माता पिता का पारस्परिक व्यवहार–माता-पिता को योग्य है कि वे स्वयं अधर्म से दूर रह कर सन्तान को धर्म में प्रेरित करें और उन्हें सुशिक्षित करें। इसी प्रकार सन्तान का कर्त्तव्य है कि वे विद्वान् माता-पिता तथा आचार्य से उनके दोषों से अलग रह कर आर्ष-दर्शन प्राप्त करें और सदा सत्य-संकल्पी होकर अविद्यादि दोषों से दूर रहें।