Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 44

117 Mantra
12/44
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सोमाहुतिर्ऋषिः Chhand- स्वराडार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
पुन॑स्त्वादि॒त्या रु॒द्रा वस॑वः॒ समि॑न्धतां॒ पुन॑र्ब्र॒ह्माणो॑ वसुनीथ य॒ज्ञैः। घृ॒तेन॒ त्वं त॒न्वं वर्धयस्व स॒त्याः स॑न्तु॒ यज॑मानस्य॒ कामाः॑॥४४॥

पुन॒रिति॒ पुनः॑। त्वा॒। आ॒दि॒त्याः। रु॒द्राः। वस॑वः। सम्। इ॒न्ध॒ता॒म्। पुनः॑। ब्र॒ह्माणः॑। व॒सु॒नी॒थेति॑ वसुऽनीथ। य॒ज्ञैः। घृ॒तेन॑। त्वम्। त॒न्व᳖म्। व॒र्ध॒य॒स्व॒। स॒त्याः। स॒न्तु। यज॑मानस्य। कामाः॑ ॥४४ ॥

Mantra without Swara
पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसवः समिन्धतान्पुनर्ब्रह्माणो वसुनीथ यज्ञैः । घृतेन त्वँतन्वँवर्धयस्व सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः ॥

पुनरिति पुनः। त्वा। आदित्याः। रुद्राः। वसवः। सम्। इन्धताम्। पुनः। ब्रह्माणः। वसुनीथेति वसुऽनीथ। यज्ञैः। घृतेन। त्वम्। तन्वम्। वर्धयस्व। सत्याः। सन्तुः। यजमानस्य। कामाः॥४४॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वसुनीथ) वेदादि शास्त्रों के बोध रूप धन और सुवर्ण आदि धन को प्राप्त करने वाले अध्यापक वा श्रोता! (त्वम्) आप (यज्ञैः) अध्ययन-अध्यापन आदि क्रियामय यज्ञों से और (घृतेन) सुसंस्कृत घृत आदि वा जल से (तन्वम्) शरीर को नित्य (वर्धयस्व) बढ़ाओ। (पुनः) पठन-पाठन के पश्चात् [त्वा] आपको (आदित्याः) पूर्ण विद्याबल से युक्त विद्वान्, (रुद्राः) मध्य-कोटि के विद्वान्, (वसवः) प्रथम-कोटि के विद्वान्, (ब्रह्माणः) चारों वेदों के अध्ययन से 'ब्रह्मा' पद को प्राप्त विद्वान् (सम्+इन्धताम् ) प्रकाशित करें। इस प्रकार अनुष्ठान करने से (यजमानस्य) संगति और पूजा करने वाले यजमान की (कामाः) अभिलाषाएँ (सत्याः) धर्म-युक्त (सन्तु) हों ।। १२ । ४४ ।।
Essence
जो-प्रयत्न से सब विद्याओं को पढ़-पढ़ाकर बार-बार सत्संग करते हैं--
कुपथ्य और विषय के परित्याग से शरीर और आत्मा के आरोग्य को बढ़ाकर नित्य पुरुषार्थ करते हैं, उन्हीं के संकल्प सत्य होते हैं, अन्यों के नहीं ॥
Subject
कैसे मनुष्य सत्य संकल्प वाले होते हैं, इस विषय का उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
सत्य संकल्प करने के साधन--हमारी इच्छायें पूर्ण हों, एतदर्थ आवश्यक है कि हमारा शरीर यज्ञमय अर्थात् परोपकारी हो और यज्ञादि श्रेष्ठ कार्यों से तथा घृतादि पौष्टिक पदार्थों के प्रयोग से पूर्ण स्वस्थ हो। सत्याः=हमारी इच्छायें भी शुभ हों, तभी पूर्ण हो सकती हैं। शुभ इच्छाओं को पूरा करने के लिये वेदादि शास्त्रों की उत्तम विद्या तथा सुवर्णादि दूसरे धन भी होने चाहिए । इसके साथ वेद का विद्वान् आदित्य, रुद्र तथा वसु--इन तीन प्रकार के विद्वानों की संगति से अच्छी प्रकार प्रकाशित हो, तब ही सत्य-संकल्पी बन सकता है ।