Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 43

117 Mantra
12/43
Devata- अग्निर्देवता Rishi- सोमाहुतिर्ऋषिः Chhand- आर्ची पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स बो॑धि सू॒रिर्म॒घवा॒ वसु॑पते॒ वसु॑दावन्। यु॒यो॒ध्यस्मद् द्वेषा॑सि वि॒श्वक॑र्मणे॒ स्वाहा॑॥४३॥

सः। बो॒धि॒। सू॒रिः। म॒घवेति॑ म॒घऽवा॑। वसु॑पत॒ इति॒ वसु॑ऽपते। वसु॑दाव॒न्निति॒ वसु॑ऽदावन्। यु॒यो॒धि। अ॒स्मत्। द्वेषा॑सि। वि॒श्वक॑र्मण॒ इति॑ वि॒श्वऽक॑र्मणे। स्वाहा॑ ॥४३ ॥

Mantra without Swara
स बोधि सूरिर्मघवा वसुपते वसुदावन् । युयोध्यस्मद्द्वेषाँसि । विश्वकर्मणे स्वाहा ॥

सः। बोधि। सूरिः। मघवेति मघऽवा। वसुपत इति वसुऽपते। वसुदावन्निति वसुऽदावन्। युयोधि। अस्मत्। द्वेषासि। विश्वकर्मण इति विश्वऽकर्मणे। स्वाहा॥४३॥

Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi

हिन्दी
Dayanand Yajurveda Bhashya Bhaskar Hindi - हिन्दी
Meaning
हे (वसुपते) वसु अर्थात् धनों के पालक, (वसुदावन्) वसु अर्थात् धनों को सुपात्रों को देने वाले, (मघवा) पूजित विद्या से युक्त (सूरिः) मेधावी विद्वान्! आप सत्य को (बोधि) जानो। (सः) वह श्रोता और वक्ता (विश्वकर्मणे) सब शुभ कर्मों के अनुष्ठान के लिये [स्वाहा] सत्य वाणी का उपदेश करता हुआ (अस्मत्) हम से (द्वेषांसि) द्वेष-युक्त कर्मों को (वि+युयोधि) सदा दूर करे ।। १२ । ४३ ।।
Essence
जो मनुष्य ब्रह्मचर्य से जितेन्द्रिय होकर द्वेष को छोड़कर धर्म से उपदेश करके और सुनकर प्रयत्न करते हैं, वे ही धार्मिक विद्वान् सब सत्य और असत्य को जान सकते और उपदेश कर सकते हैं, हठ और अभिमान से युक्त दूसरे क्षुद्राशय लोग नहीं।
Subject
मनुष्य लोग क्या करके किस को प्राप्त हों, यह उपदेश किया है ।।
Commentary Essence
अध्यापक कैसा हो- (१) वसुपतिः=विद्यारूप धन का पालक हो। (२) वसुदावन् = विद्या धन को योग्य शिष्यों को देने वाला हो। (३) मघवा=पूर्ण विद्या के कारण सर्वत्र पूजित हो । (४) सूरिः=मेधावी हो। (५) स्वाहा=सत्योपदेश करने वाला हो । (६) द्वेषादि दुर्गुणों से दूर रहने वाला हो ।।